Wednesday, 6 April 2011

साहित्यिक वर्ण-संकरता-: तथ्य---मैथिली साहित्य का विकिलीक्स

Maithili Wikileaks soon in English
---मैथिली साहित्य का विकिलीक्स,,,,,,,,,,,,,,,,
http://saketanands.blogspot.com/ तहिना एक टा साहित्यिक रंगदार बिहरि स'बहरेला अछि अजित कुमार आज़ाद जी। लिखतथि-पढितथि त'से जथ-कथ,भरि
पटना घुमि-घुमि क'एकर बात ओकरा त'कोनो गुलछर्रा अनेरे उडबैत रहता,लोक के लडबैत,तरह-तरह के लांछन लगबैत समय गमेता।एखन फेस बुक पर ओ लिखै छथि जे हम, उषाकिरण जी आ भाई साहेब ( राजमोहन जी) मैथिली कथा के
हिंदी अनुवाद क' हिंदियो के लेखक सब मे अपन नाम करै लए चाहै छी।....

saketanands.blogspot.com
54 minutes ago · · · Share


    • Ashish Anchinhar
      saketanands ...तहिना एक टा साहित्यिक रंगदार बिहरि स'बहरेला अछि अजित कुमार आज़ाद जी। लिखतथि-पढितथि त'से जथ-कथ,भरि
      पटना घुमि-घुमि क'एकर बात ओकरा त'कोनो गुलछर्रा अनेरे उडबैत रहता,लोक के लडबैत,तरह-तरह के लांछन लगबैत समय गमेता।एखन फेस बुक पर ओ लिखै छथि जे हम, उषाकिरण जी आ भाई साहेब ( राजमोहन जी) मैथिली कथा के
      हिंदी अनुवाद क' हिंदियो के लेखक सब मे अपन नाम करै लए चाहै छी। हम्रर मैथिली कथाक सब हिंदी अनुवाद मे"मैथिली कथा" शीर्षकेक संग छपल रहै छैक,से हुनका नंइ सुझै छनि । आंखि मे गेजड जं भ'जाय,त'कोना सुझत ? हमर एहन कथा "काल रात्रिश्च दारुणा" जुलाइ 2009 के वागर्थ पत्रिका मे छपल अछि, से
      देखौत,किंबा हमर कोनो हिंदीक रचना देखा दौथ जाहि मे ई नंइ लिखल हुए जइमे मैथिलीक कथाक उल्लेख नंहि हुए त'मानि जेबनि ।बिना आधारक एहेनसब बात लिखब साहित्यिक रंगदारी नंइ त' आर की कहौतै? ...saketanands

      53 minutes ago · · 2 people

Ajit Azad rangdar...tahu me sahityik rangdar manbak lel dhanyawad sir (saketanand) ji...ee baat ta ona besi gote manait chhaith...muda ahan manlahun ta bujhu karej juray gel...dhanyawad sir.
Ajit Azad
Atyant dukhad samachar...maithilik prasiddh lekhak SAKETANAND ji ke pet me cancer bha gelain achhi...o patna chhori delain achhi. ekhan o purniya me chhiath. hunak pata achhi...PUNAHSHCH, Shrinagarhata, purniya-854301 (mobile 09431046447). hunka apan shubhkamna diyain.


    • Prakash Jha dukhad samaachar.. achhi bhae..
      Wednesday at 1:43pm ·  2 people

    • Manoj Kumar Mandal ulcer va cancer nai, ai tarahak vyaktigat jankari hamara sabh ke bina sambandhit vyaktik anumatik nai sarvajanik karbak chahi.. kon bimari kakra hoyat aai se takar kon thekan
      Yesterday at 12:18am ·  5 people

    • Mihir Kirti ANHAK SOOCHAN SAN LGAIYA JENA ANHA PRASSN CHII EHI GAPP SAN.
      11 hours ago ·  3 people

    • Mihir Kirti Ajit Azad-----MANI LIA JAN EHI SUCHNA KE AADHAR PAR SAKETANAND KE PHONE JAE LAGTAINH BECHRE SAKETA JI 10 DIN KE BADLA ME 1 KAIYI DIN ME MARI JETAH. HAMRA BUJHNE ANHA I SUCHNA NAHI HUNKAR HATYAK PLAN ACHI.
      11 hours ago ·  3 people

    • Mihir Kirti Ajit Azad--- AA HUNKA JAN KICHU BAHE GELANHI TAN HUNKR HTYAK KALANK ANHI PAR HOYAT.
      11 hours ago ·  3 people

 

Ajit Azad
pandit govind jha maithilik rachnakar se gap karay chahait chhaith...maithili sahityak gatividhik made janay chahait chhaith. hunka ekar dukh chhainh je lok apan puran rachnakarmi sabhak khoj-khabair nai lait chhaith. kailh hunak aavwas (104, sati chitrakut appartment, west patel nagar, patna-23, mobile-09471866907) par gel rahi. lagbhag 90 varshak ee bahubhashavid sahityakar ekhno khoob sakriyay chhaith, khoob likhait chhaith. ki ahan lokain hunka se gap karay chahab....

  • Kumud Singh likes this.

    • Prakash Jha bhut deri s' nav lok mon paralainhi achhi .. ehane haala O sab gote ke hetani je apan nav pidhi ke izzat nhi dethin .... bahuto rachana kaar ehan chhthi jinka ehi tarahak sthiti nhi etani ... o lokani apan nav pidhi ke hardam sang rakhait chhathi....
      Wednesday at 1:45pm ·  4 people

    • Umesh Mandal guru bhetani asan achhi muda neek shishya bhetanai bad moshkil jena vivekanand kahane chhathi
      Thursday at 10:42pm ·  2 people
  • साहित्यिक वर्णसंकरता

    by Ashish Anchinhar on Friday, February 18, 2011 at 9:45am

    मैथिली साहित्य के साथ अजीब विडंबना यह रही है कि, इसे अधिकांशतः वर्णसंकर साहित्यकार मिला । अनुमानतः 90% मैथिली साहित्यकार सिर्फ मैथिली मे इसीलिए लिखते है क्योंकि उसे हिंदी से रिफ्यूज कर दिया जाता हैं। मैं दो या अधिक भाषाओं मै एक ही लेखक द्वारा लिखने का विरोधी नही हूँ। मगर आज तक मुझे यह समझ मे नहीं आयी कि एक ही रचना दो या अधिक भाषाओं मे मौलिक कैसे हो जाती हैं। वैद्दनाथ मिश्र "यात्री'' उर्फ बाबा नागार्जुन के द्वारा शुरुआत की गयी यह वर्णसंकरता आज मैथिली मे जड़ जमा चुकी है। मायानंद मिश्र, गंगेश गुंजन, उषा किरण खान, तारानंद वियोगी, विभा रानी, गौरी नाथ, श्रीधरम, सत्येनद्र झा, और न जाने कितने साहित्यकार इस कोटि मे आते हैं। सबसे दुखद पहलू यह है कि इसी तरह के साहित्यकार अकादेमी और संस्था से पुरस्कृत होते हैं। फलतः जनमानस मे न तो इस तरह के साहित्यकार के प्रति आदर होती है और ना ही पुरस्कार देने वाले के प्रति। ना जाने कितने भुलक्कड़ मैथिली के साहित्यकार होते हैं, दिन-रात गीता तो पढ़ेंगे मगर कृष्ण का यह वाक्य भूल जाते है कि वर्णसंकरता से कुल, परिवार,, समाज सभी नष्ट हो जाता है------------। और मैं इसमे सिर्फ यही जोड़ना चाहता हूँ कि जब कुल, परिवार, समाज नष्ट हो जाएगा तो भाषा का नष्ट होना तो निश्चित ही है ( जीव वैज्ञानिक वर्ण संकरता को इस से अलग रखे) ।

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    You, Umesh Mandal, Vinit Utpal, Shefalika Verma and 3 others like this.
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    Gajendra Thakur

    see the link http://videha.co.in/new_page_8.htm where translation of "Mohandas" by Uday Prakash into Maithili is being undertaken by Shri Vinit Utpal; Sh. Uday Prakash writes:-

    ""विनीत उत्पल जी, 'मोहन दास' को उस मैथिली में ले जाने के लिए जो विद्यापति, आदि सहित बाबा नागर्जुन की काव्य-जीवन भाषा भी रही है, जिसे विश्वप्रसिद्ध संगीतज्ञ यहूदी मेनुहिन (और संभवत: रवींद्ननाथ टैगोर ने भी) संसार की सबसे मधुर और लयात्मक भाषा माना था और जो हिंदी-खड़ीबोली से भी प्राचीन और सृजन-समृद्ध भाषा रही है, आपका हृदय से धन्यवाद! विश्वास है कि आपके इस प्रयत्न से मोहन दास की पीड़ा और उसकी चिंताओं से मैथिली के पाठक और प्रबुद्धजन परिचित हों सकेंगे।
    नये वर्ष २०११ में, जो कि संयोग से इस सदी के दूसरे दशक की शुरूआत भी है, आपके द्वारा दिया गया यह उपहार अन्यतम है।
    ढेरों सृजनात्मक शुभकामनाओं के साथ
    आपका
    उदय प्रकाश ""हम ईहो कह' चाहब जे "मैथिलीक चौधराहट जाति विशेष ल'ग छै" नै छल कहियौ, जगदीश प्रसाद मंडल जी, राजदेव मंडल, बेचन ठाकुर, उमेश मंडल, आ ढेर रास मैथिलीक सेनानी अहाक सोझां छथि, "आन लोक सोलकन छथि. त' आन लोक कोना मैथिली के अपन मातृभाषा कहय?" ई गप हिनका सभक सोझां बाजि क' देखू| ब्राह्मण/ कायस्थ तं मैथिली बजनाइ छोडि देने छथि, मात्र साहित्य अकादेमी पुरस्कार लेल लिखै छथि, मैथिली- हिन्दी दुनूमे| अपवाद सेहो छथि आ से रहताह |
    मैथिल कहाब' मे संकोच जे करै छथि हुनकर पैर पकडि क' कोनो फैदा नै| हुनका टा टा, बाइ बाइ |


    February 18 at 11:21am · Like · 3 people
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    Musafir Baitha आपके वर्णसंकर विषयक विचारों से प्रायः सहमत न होते हुए भी इन बातों से इत्तिफाक रखता हूँ कि "एक ही रचना दो या अधिक भाषाओं मे मौलिक कैसे हो जाती हैं। वैद्दनाथ मिश्र "यात्री'' उर्फ बाबा नागार्जुन के द्वारा शुरुआत की गयी यह वर्णसंकरता आज मैथिली मे जड़ जमा चुकी है। मायानंद मिश्र, गंगेश गुंजन, उषा किरण खान, तारानंद वियोगी, विभा रानी, गौरी नाथ, श्रीधरम, सत्येनद्र झा, और न जाने कितने साहित्यकार इस कोटि मे आते हैं। सबसे दुखद पहलू यह है कि इसी तरह के साहित्यकार अकादेमी और संस्था से पुरस्कृत होते हैं।"

    February 18 at 6:09pm · Like · 2 people
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    Ashish Anchinhar ‎@musafir , dhanyvad.

    February 18 at 6:16pm · Like
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    Binit Thakur barn sankar ke sangya nahi del jaaya. bhasha je bhi ho yadi mithilak gungan aa apan mait-pain ke jankari chhaik ta ati uttam baat. ona maithili bhashi sahityakaar sav ke mathili aa mithilakshar (tirhuta lipi) prati udaar hebaak chahi. apan bhasha me besi sa besi lekh rachana prasut ka jan-jan me pahuchebak prayash karbaak chahi jaahi sa aam janmanasme apan bhasha aa sahityak prati udgaar badhaik. lok padhaik aa bujhaik je e hamar dharohar chhi.

    February 19 at 10:11am · Like · 1 person
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    Ashish Anchinhar ‎@binit thakur, anhak comment hmar vishy san hati kae achi.kripya note padal jae.

    February 19 at 10:43am · Like · 1 person
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    Vinit Utpal आशीष जी, आपने मैथिली के स्याह पक्ष को उजागर किया है. यदि इस तरह लोग मौलिकता के नाम पर इस तरह हिन्दी और मैथिली भाषा में अपने नाम का ढिढोरा पीट-पीट कर नाम और पुरस्कार दोनों पा रहे हैं तो मामला गंभीर है. ऐसे लोगो में यदि थोसी भी मनुष्यता के साथ-साथ लोक-लाज बची है, तो अपनी बात रखनी चाहिए और सफाई देनी चाहिए.

    Monday at 3:46pm · Like

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    Gautam Rajrishi

    बात मैथिली के लिए उठाई गई है तो तर्क-संगत है, लेकिन आपका ये कथन " एक ही रचना दो या अधिक भाषाओं मे मौलिक कैसे हो जाती हैं" स्पष्ट नहीं हो पा रहा है, आशीष जी| अगर हम अनुवाद पे ऊंगलियाँ उठाने लगेंगे तो फिर विश्व साहित्य की जाने कितनी अनमोल कृत...ियों से वंचित रह जाएँगे| मुझे रूसी भाषा नहीं आती, लेकिन मैक्सिम गोर्की के "मदर" को इंगलिश में भी पढ़ कर मैं उसे उतना ही मौलिक समझता हूँ जितना कोई रसियन उसे अपनी भाषा में पढ़कर समझता होगा|See More

    Saturday at 6:07pm · UnlikeLike · 2 peopleLoading...
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    Priyanka Jha गौतम जी, आशीष जी ने अनुवाद पर सवाल नहीं उठाया है, उन्होंने अनुवाद को मौलिक कह पुरस्कार के लिए पडोसे जाने पर उँगली उठायी है। ..

    29 minutes ago · UnlikeLike · 1 personYou like this.
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    Priyanka Jha

    गौतम जी " एक ही रचना दो या अधिक भाषाओं मे मौलिक कैसे हो जाती हैं" इसका मतलब हुआ कि "ये पाया तो क्या पाया" हिन्दी में मौलिक हो गया और "ई भेटल त की भेटल" में लेखक ने ये नहीं लिखा कि यह लेखक द्वारा स्वयं हिन्दी से मैथिली में तीन साल बाद अनूदित... हुआ। अन्य उदाहरण में भी बिना रेफेरेंस के पुरस्कार के लिए ऐसा किया गया. यदि ऐसी पुस्तकों को अनुवाद पुरस्कार दिया जाए तो कोइ दिक्कत नहीं ; परंतु ये पुस्तकें हिन्दी और मैथिली दोनों में मौलिक होकर मैथिली में अनुवाद पुरस्कार के बजाय मौलिक पुरस्कार पा जाती हैं। हिन्दी में जब इन्हें कोइ नहीं पूछता तो ये मैथिली में अनुवाद कर मौलिकता की खिल्ली उडाते हैं और मैथिलीपर अहसान करते हैंSee More

    22 minutes ago · UnlikeLike · 1 person

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    Gautam Rajrishi
    प्रियंका जी, बिल्कुल...मैं तो पूरी तरह सहमत हूँ आशीष जी की बातों से...मैंने तो बस उनके उस कथन पर प्रश्न उठाया था जब वो कहते हैं कि "एक ही रचना दो या अधिक भाषाओं मे मौलिक कैसे हो जाती हैं"...वो अपनी बात को स्पष्ट नहीं रख रहे हैं| ये तो हर ले...खक की नैतिक ज़िम्मेदारी होती है कि वो अपनी अनूदित रचना की घोषणा उस पुस्तक में खुद करें| आपके दिये हुये लिंक पर गजेन्द्र जी की कितनी अच्छी टिप्पणी है जब वो गैब्रियल मारकेज की रचना का संदर्भ देते हैं| आशीष जी के इन दोनों आलेखों का वरिष्ठ रचनाकारों द्वारा स्वागत होना चाहिए, किन्तु हो रहा है ठीक विपरीत...और ये हमारे साहित्य चाहे मैथिली या कोई भी भाषा, के लिए दुर्भाग्य की बात है| चलिये , आशीष जी के इस आलेख के बहाने ये बातें सामने तो आयीं और उन लोगों तक बात पहुंची भी है, जहाँ पहुंचनी चाहिये| जून में छुट्टी जा रहा हूँ तो पूरा प्रकरण माया बाबू के समक्ष रखता हूँ| पड़ोसी हूँ उनका, देखते हैं क्या कहते हैं वो इस बारे में| वैसे तो इतना ऊँचा सुनने लगे हैं कि उनको पूरी बात सुनाना अच्छी मशक्कत होगी :-)
    about an hour ago · · 1 personYou like this.
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  • आइकाल्हिक समालोचक तितिर बटेरजकाँ कुदैत रहैत छथि |चिन्हार होमय लेल पूज्य सर्वमान्य मैथिली साहित्यकार कए गारि तक देबय मे संकोच नहि करैत छथि |यात्री –नागार्जुन वाअन्य साहित्यकार मिथिले मे नहि भारतवर्ष मे प्रसिद्ध छथि आ तिनका सभ कए वर्णसंकर कहि अपने मुँह मे कारी चुन लगा रहल छथि ओना चुगला मिथिलो
    मे अनचिन्हार थोरे छैक ?
    February 18 at 9:40pm · ·

  • आलोचना करब नीक बात मुदा गारि पढब अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण |आलोचना मे शिष्टाचार कए नहि बिसरबाक चाही |मैथिलीक किछु नव आलोचक सभ कए अनर्गल शब्द कए ब्यवहार करय मे असीम आनंद होयत छनि |यात्री ,गंगेश
    गुंजन ,मायानन्द जी ...आदि कए गारि दय कियो चिन्हार भय सकैत छथि मुदा यशस्वी कथमपि नहि |
    February 21 at 9:18am · ·


      • Gajendra Thakur
        रवीन्द्रनाथ ठाकुर अंग्रेजीमे गीतांजलीक अनुवाद केलन्हि मुदा मूल बांग्लासँ ओकरा स्वयं लेखक द्वारा अनूदित सएह कहलन्हि। मैथिलीसँ हिन्दी वा दोसर भाषामे अनुवाद हुअए आ हिन्दी आ दोसर भाषासँ मैथिलीमे सेहो हुअए। मुदा हिन्दीक पाठकक हक बनै छै जे ओकरा बताओल जाए जे ओ मूल हिन्दीमे पढ़ि रहल अछि वा मैथिलीसँ अनूदित पढ़ि रहल अछि। तहिना मैथिलीक पाठककेँ सेहो ई जनबाक हक छै जे ओ मूल मैथिली पढ़ि रहल अछि वा हिन्दीसँ स्वयं लेखक द्वारा अनूदित रचना पढ़ि रहल अछि। जहाँ धरि यात्रीजीक गप छन्हि ओ अपना जीविते ई कहि गेल छथि जे ओ बलचनमा मैथिलीमे मूल लिखने रहथि आ तकरा हिन्दीमे अनूदित केने रहथि। ई भार मैथिलीक ओइ जीवित लेखक सभपर छन्हि जे बिना कॉमा फुलस्टोपक अंतरक दुनू भाषामे एक्के बौस्तु लिखै छथि जे ओ स्वयं घोषित करथि जे हुनकर कोन रचना मैथिलीमे मौलिक छन्हि आ कोन हिन्दीसँ अनूदित।


        February 23 at 2:35pm · · 1 person

      • Satya Narayan Jha अपनेक कहब सही अछि | अपने मैथिल पुत्र छी | माँ मैथिलीक सेवा अनवरत कए रहल छी |शिष्टता अपनेक संग अछि |अपने जे प्रश्न उठेलौ अछि, समन्धित साहित्यकार कए उत्तर देबाक चाही |अपनेक प्रश्नक हम समर्थन
        करैत छी |धन्यबाद |

        साहित्यिक वर्ण-संकरता-: तथ्य---मैथिली साहित्य का विकिलीक्स

        by Ashish Anchinhar on Monday, April 4, 2011 at 3:10pm


        आज मैं फिर से अपने दूसरे नोट ,जो की मूलतः पहले ही नोट का उतरार्ध है (पूर्वाध पढ़ने के लिये यहाँ क्लिक करें http://www.facebook.com/note.php?note_id=195911623760517) को लेके आया हूँ।
        मुझे इस बात से खुशी है कि मेरे द्वारा रखी गयी समस्या पर सकारात्मक टिप्पणियाँ आयी, मगर इस बात की पुष्टि भी हुई कि " काबुल में गधे भी होते हैं"। उदाहरण के लिए श्री सत्य नारायण झा जी को ही लीजिये। ये मैथिली साहित्य में अज्ञात कुल-शील के हैं और इन महाराज ने मेरे नोट पर सीधे टिप्पणी न देते हुए अपने वॉल पर टिप्पणी दी और मेरे द्वारा प्रस्तुत साहित्यिक संकरता को अपने फायदे के लिए में बदल डाला। मुझे यह पता नहीं कि इस से इन महोदय को क्या फायदा मिला होगा लेकिन मुझे यह पता चल गया कि ये अपने फायदे के लिए कितने निम्न स्तर तक जा सकते हैं। फिर भी उन्हें अपने ही वॉल पर टिप्पणी देने के लिये धन्यवाद।


        अब हम आगे की ओर देखें। आपको याद होगा ही कि वैद्यनाथ मिश्र यात्री उर्फ बाबा नागार्जुन को मैथिली साहित्य में व्याप्त इस साहित्यिक संकरता के लिये जिम्मेदार ठहराया गया था। तो इस नोट की शुरुआत भी उन्हीं से करते हैं। “यात्री” जी यह तो स्वीकारते है कि “बलचनमा” उन्होने मूलतः मैथिली में लिखी है( संदर्भ--- यात्री समग्र, राजकमल प्रकाशन) मगर हिन्दी में प्रकाशित “बलचनमा” में कहीं भी उन्होंने यह नहीं लिखा कि यह मैथिली से अनूदित है (यहाँ यह बताना अनुचित न होगा कि मूल मैथिली बलचनमा मिथिला सांस्कृतिक परिषद् , कलकत्ता से FEB 1967 प्रकाशित हुआ) । साथ ही साथ मैथिली की उनकी “नवतुरिया” और हिन्दी की “नई पौध” एक ही है और दोनों भाषाओं में मौलिक है! कई आलोचकों ने यह भी आरोप लगाया है कि यात्री की मैथिली में साहित्य अकादेमी पुरस्कृत पुस्तक “पत्रहीन नग्न गाछ” की कई कवितायें हिन्दी में भी है। “यात्री” के बाद मायानंद मिश्र इस संकरता के सबसे बड़े व्यापारी हैं। मैथिली में 1988 में साहित्य अकादेमी पुरस्कार मायानंद के “मंत्रपुत्र” को मिला और 1989 में यह राजकमल प्रकाशन से हिंदी की मौलिक पुस्तक के रूप में प्रकाशित हुई। उक्त पुस्तक मैथिली की मौलिक पुस्तक नहीं है इसकी पुष्टि इस बात से होती है कि यह पुस्तक अपने सिरीज की दूसरी पुस्तक है और केवल यही दूसरी पुस्तक मैथिली में है। शेष तीनों पुस्तक क्रम से पहली---“प्रथमं शैल पुत्री च”, तीसरी—“पुरोहित” और चौथी “स्त्रीधन” हिंदी में है। केवल पुरस्कार पाने के लिये माया ने इसे मैथिली में अनुवाद कर पुरस्कार प्राप्त कर लिया- मैथिली अनुवाद पुरस्कार नहीं वरन मैथिली के लिये मूल पुरस्कार ( यहाँ यह उल्लेख करना गलत न होगा की माया के साथ-साथ वे भी दोषी हैं, जिन्होने पुरस्कार दिया)। मंत्रपुत्र हिंदी की मौलिक पुस्तक है, यह कलकत्ता से प्रकाशित हिंदी की पत्रिका स्वर-सामरथ से भी ज्ञात होती है। जिज्ञासु इसे राष्ट्रीय पुस्तकालय से प्राप्त कर सकते हैं। ( अंकों की पूछताछ ना करें- 8-10 अंक ही प्रकाशित हो पायी यह पत्रिका) ।
        इस घृणित व्यापार की रानी हम उषा किरण खान को कहें तो गलत न होगा। पहले तो उन्होनें 1995 मे “हसीना मंजिल” नामक उपन्यास को प्रकाशन मंच से मैथिली मे प्रकाशित करवाया फिर इसी पुस्तक को मूल हिंदी के रूप में वाणी प्रकाशन से 2008 मे प्रकाशित करवा डाला। इसके बाद भी मन नहीं भरा तो DECEMBER 2007 मे प्रकाशन मंच से मूल मैथिली में “भामती” नामक उपन्यास प्रकाशित कर “हसीना मंजिल” की तरह इसे 2010 में मूल हिंदी के उपन्यास के रूप में बाजार में डाल दिया। और इसी “भामती” को वर्ष 2010 के लिये मैथिली की मौलिक पुस्तक के रूप में साहित्य अकादेमी पुरस्कार मिला। इसी तरह तारानंद वियोगी ने अपने हिंदी बाल-कथा पुस्तक “यह पाया तो क्या पाया” 2005 मे प्रकाशित करवाया ( देखिये उन्हीं की मैथिली आलोचना की पुस्तक “कर्मधारय” का फ्लैप) और फिर 2008 में उसे मैथिली में अनुवाद कर वर्ष 2010 के लिये प्रथम मैथिली बाल साहित्य अकादेमी पुरस्कार प्राप्त कर लिया। इसी कड़ी में कुछ और नाम भी हैं जैसे--- विभा रानी द्वारा लिखी मैथिली कथा “बुच्ची दाइ” oct-dec 2006 में मैथिली त्रैमासिक पत्रिका घर-बाहर में छपी और यही मूल हिन्दी कहानी के रूप में नवनीत feb-2007 में “यूँ ही बुल्ली दाइ” के नाम से प्रकाशित हुई। NBT द्वारा 2007 मे प्रकाशित मैथिली कथा संग्रह "देसिल बयना" (संपादक--- तारानंद वियोगी) में श्रीधरम की मूल मैथिली कथा ब्रह्मन्याय और कथादेश में छपी श्रीधरम की ही मूल हिन्दी कहानी नव(जातक कथा), दोनों एक ही हैं।


        इसके अलावा और भी कई लेखक इस व्यवसाय में लिप्त है और मैं उनकी तहकीकात कर रहा हूँ , जैसै ही नये नाम मेरे सामने आयेगें मैं फिर हाजिर हो जाउँगा आपके सामने। और यहाँ पर यह कहना कुछ गलत न होगा कि जिनका नाम (इस व्यवसाय में लिप्त लेखक ) इस नोट में नहीं आ पाया है, वे अपने आप को अपराध मुक्त ना समझें। एक बात और, इस व्वसाय में लिप्त अधिकांश लेखक जीवित हैं, उनसे मेरा निवेदन है कि वे अभी भी पाठकों को सूचित करें कि उक्त पुस्तक किस भाषा में मौलिक है। अगर वे मैथिली में लेखन को शर्म का विषय समझते हों तो यह भी मैथिली पाठकों बतायें, और भविष्य में मैथिली भाषा में लेखन ना करें।
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          • Vinit Utpal आशीष जी, आपने मैथिली के स्याह पक्ष को उजागर किया है. यदि इस तरह लोग मौलिकता के नाम पर इस तरह हिन्दी और मैथिली भाषा में अपने नाम का ढिढोरा पीट-पीट कर नाम और पुरस्कार दोनों पा रहे हैं तो मामला गंभीर है. ऐसे लोगो में यदि थोसी भी मनुष्यता के साथ-साथ लोक-लाज बची है, तो अपनी बात रखनी चाहिए और सफाई देनी चाहिए.
            Monday at 3:46pm · · 2 people

          • Avinash Das यह एक बहसतलब मसला जरूर है, लेकिन इस मसले को जितनी घृणा और आक्रोश से आपने उठाया है, वह उचित नहीं है। भाषा से ज्‍यादा जरूरी ये है कि आप किसी भी भाषा में कहते/लिखते क्‍या हैं। अमर-सुमन के मैथिली पर बहुत उपकार हैं, लेकिन उनके साहित्‍य से थोथे चने की आवाज आती है। विद्यापति को हिंदी का आदिकवि कहते हैं और बंगालियों के भी विद्याप‍ति पर अपने दावे हैं। भाषाई मौलिकता दरअसल एक भ्रम ही है। कहन की मौलिकता दरअसल ज्‍यादा मायने रखती है।
            Monday at 4:16pm · · 2 people

          • Gajendra Thakur
            १. मैथिली के लेखकों को (यदि वे जीवित हैं तो ) अपनी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए|
            २.कथ्य महत्वपूर्ण है, और यदि हिन्दी की पुस्तक में मैथिली से अनूदित, और मैथिली की पुस्तक में हिन्दी से अनूदित लिखने से कथ्य अमहत्वपूर्ण नहीं हो जाता|
            ३.अविनाश जी, मैथिली साहित्य अब अमर- सुमन से आगे जा चुका है | जगदीश प्रसाद मंडल, बेचन ठाकुर , राजदेव मंडल आदि लेखक इसे जिस ऊंचाई पर ले जा चुके हैं वहां आपको थोथा चना (माफ करें इसका मतलब आप स्पष्ट नहीं कर सके, हां ये समझा में आया कि अमर-सुमन के प्रति आप "घृणा और आक्रोश से " ग्रस्त हैं, जिसका आरोप आपने आशीष पर लगाया है ) नहीं वरन साहित्य का सर्वोच्च शिखर दिखेगा|
            ४.हिन्दी और बंगला के लोग विद्यापति की मैथिली कवी के रूपा में क़द्र करते हैं यह यही साबित करता है कि " भाषाई मौलिकता एक भ्रम नहीं " वरन मैथिली में अच्छा लिखने वालों को हिन्दी के वैशाखी की जरूरत नहीं| यहां मैं उदय प्रकाश के ई-पत्र को रखना चाहूंगा- ""विनीत उत्पल जी, 'मोहन दास' को उस मैथिली में ले जाने के लिए जो विद्यापति, आदि सहित बाबा नागर्जुन की काव्य-जीवन भाषा भी रही है, जिसे विश्वप्रसिद्ध संगीतज्ञ यहूदी मेनुहिन ने संसार की सबसे मधुर और लयात्मक भाषा माना था और जो हिंदी-खड़ीबोली से भी प्राचीन और सृजन-समृद्ध भाषा रही है, आपका हृदय से धन्यवाद! विश्वास है कि आपके इस प्रयत्न से मोहन दास की पीड़ा और उसकी चिंताओं से मैथिली के पाठक और प्रबुद्धजन परिचित हों सकेंगे।
            नये वर्ष २०११ में, जो कि संयोग से इस सदी के दूसरे दशक की शुरूआत भी है, आपके द्वारा दिया गया यह उपहार अन्यतम है।
            ढेरों सृजनात्मक शुभकामनाओं के साथ
            आपका
            उदय प्रकाश"

            हिन्दी की पैदाइश के पहले विद्यापति हुए , बंगला के लोगों ने कब का विद्यापति को मैथिली का कवी माना लिया, अरविंदो ने विद्यापति का अंग्रेजी अनुवाद भी किया | पर ये सब कभी और विस्तार में ...

            ५. मैथिली के पाठकों को ये अधिकार है कि उन्हें बताया जाए कि वे मूल मैथिली में पढ़ रहे हैं या हिन्दी से अनूदित ; इसी तरह हिन्दी के पाठकों को भी यह अधिकार है कि उन्हें बताया जाए कि वे मूल हिन्दी पढ़ रहे हैं या मैथिली से अनूदित | अनुवाद की एक सीमा होती है, भले ही वह लेखक द्वारा स्वयं क्यों न किया गया हो, इससे पाठक उस लेखक को और भी सम्मान देगा..


            Monday at 5:30pm · · 2 people

          • Ashish Anchinhar neek bahi
            Monday at 5:34pm ·

          • Avinash Das ‎@ Gajendra Thakur : साहित्‍य का सर्वोच्‍च शिखर क्‍या होता है, मैं नहीं जानता, इतना जानता हूं कि जो लोकल है, वही मौलिक है, ग्‍लोबल है। इस नाते किसी स्‍थानीय भाषा में अपने को अभिव्‍य‍क्‍त करना ज्‍यादा न्‍यायसंगत बात होगी। मैं भी मैथिली में लिखता हूं और वही लिखता हूं, जो हिंदी में नहीं लिख सकता। मैथिली में अपने लिखे का अनुवाद खुद भी मैं हिंदी में नहीं कर सकता, दूसरे क्‍या करेंगे। अभी एनबीटी ने मेरी कुछ कविताओं का अनुवाद छापा है। वह इतना घटिया और नकली लगता है कि उसे पढ़कर लगता है कि मेरी कविता की आत्‍मा मर गयी।
            Monday at 5:41pm ·

          • Pankaj Jha Kuch nasha "TRIENGE" ki aan ka hai,
            Kuch nasa "MATRABHUMI" ki shan ka hai.
            HUM laharayege aaj Desh mai TRINGA,
            Nasha ye "BHARAT" K "MAAN" KA HAI...

            Monday at 5:43pm ·

          • Avinash Das दूसरी बात... जिन कुछ लेखकों पर आपने उंगली उठायी है, उनमें से बाकी लोगों की बातें तो मैं नहीं करूंगा। नागार्जुन और वियोग के बारे में इतना कहना चाहता हूं कि ये भाषाई खजाने के मामले में धनी लोग रहे हैं। ये आसानी से एकाधिक भाषाओं में आवाजाही कर सकते हैं। हिंदी में जबकि यश और लाभ की प्रचुर संभावनाएं थीं, हैं - इन्‍होंने मैथिली में लिखा। हम जैसे लोग तो बेईमान हैं, लेकिन इन लेखकों की इस कुर्बानी को किनारे करके आप जिस तरह की बहस छेड़ रहे हैं - वह ठीक नहीं लगता।
            Monday at 5:45pm ·

          • Avinash Das वियोग को वियोगी पढ़ें... इनका पूरा नाम तारानंद वियोगी है।
            Monday at 5:46pm ·

          • Pankaj Jha Kuch nasha "TRIENGE" ki aan ka hai,
            Kuch nasa "MATRABHUMI" ki shan ka hai.
            HUM laharayege aaj Desh mai TRINGA,
            Nasha ye "BHARAT" K "MAAN" KA HAI...

            Monday at 5:46pm ·

          • Avinash Das एक बात और, मुझे अफसोस है कि मैं अभी जगदीश प्रसाद मंडल, बेचन ठाकुर , राजदेव मंडल जी का साहित्‍य नहीं पढ़ पाया हूं। लेकिन मैथिली पाठकों के जिस अधिकार की आप बात और वकालत कर रहे हैं गजेंद्र जी, क्‍या आप बता सकते हैं कि उनकी संख्‍या कितनी है? हजार, दो हजार, तीन हजार, दस हजार, लाख... ? पाठक ही लेखकों को गरिमा प्रदान करते हैं। जिस भाषा के पाठकों में आमतौर पर मुर्दनी छायी रहती है, उस भाषा के लेखकों की नियति का आकलन आप खुद कर सकते हैं...
            Monday at 5:51pm ·

          • Ashish Anchinhar Avinash Das---jaisan guru taisan chela, bahi---vidyapti hindi ke kbhi kavi nahi the.aap bevjah, hindi me naam kamane keliye , maithili ko hindi ka ang banaye ja rahe hain.aur bangali to kab ka vidyapti ko maithili ka kavi maan chuke hain.aur ek bat agar baat suman -amar ke kavy ki bat ki jae to is adhar par to hindi ka bhi chando badh kavy bekar sabit hoga.aap ne kathy ke maulikta ki baat uthayi hain, bhai jab basha hi maulik nahi hain, kathy kaya maulik hoga.
            Monday at 5:51pm ·

          • Vinit Utpal मैथिली के जो लेखक जीवित हैं, उन्हें अपनी रचना को लेकर बार स्पष्ट करनी चाहिए, अमर-सुमन और विद्यापति को लाकर यहां बहस करना उचित नहीं जान पड़ता. आशीष अनचिन्हार जी ने जो बात यहां रखी है, और उनका कहना वाकई सही है तो इन लेखकों की कारिस्तानी लोगों के सामने आनी चाहिए. हर कोई जितनी भाषा जनता है उतने में लेखन करने का अधिकार तो है, लेकिन उसके साथ उस भाषा में लेखक की सोच भी दीखनी चाहिए.
            Monday at 5:56pm ·

          • Ashish Anchinhar Avinash Das------jaisan guru taisan chela,bahi aap hindi main aapna sikka jamne ke liye vebzah maithili ko hindi ka ang bana rahe hain.aur bangali to kab ka vidyapati ko maithili ka kavi swikar kar chuke hain.aur baat amar -suamn ke kavy ki ho to is adhar par hindi ka bhi chandobadh kavy bekar hoga.aur jhanha tak kathy ke maulik hone ki bat hain , bahi jab tak basha hi maulik nahi hain kathy kya maulik hogi
            Monday at 5:57pm ·

          • Ashish Anchinhar Avinash Das-----agar nbt ne aapke maithili kavita ka anuvad achha nahi kiya to iska matlab ye to nahi hain ki aap usi rchan ko hindi ki maulik rachna banakr hindi pathko ke samne rakh denge
            Monday at 6:00pm ·

          • Ashish Anchinhar Avinash Das------------bahi baat yanha nargun ya viyogi ki nahi hain, baat ynha us ghrinit mansikta ki hain jiske tahat lekahk apni ek hi rachan ko ek se adhik basha main maulik batata hain.
            Monday at 6:02pm ·

          • Ashish Anchinhar Avinash Das----------agr koi lekhk aasni se hindi ya any bahsha main avazahi kar sakta hain to karen , lekin hrek bashaon meian alag-alag rachan ke sath. aur babu avinash ji, beiman ham log nahi hain, beiman to ve hain jo is ghrinit vyapar ke poshak hain.
            Monday at 6:06pm ·

          • Ashish Anchinhar maine kabhi hindi likhne vale ko bura nahi kaha haiin agar esa hota to meri list mae, renu aur dinkar bhi hote, magar yanha to basha hi alag hain.
            Monday at 6:08pm ·

          • Avinash Das
            ‎@ Ashish Anchinhar : थोड़ा धीरज धरिए। मेरे कहने का कुल मतलब यही था कि लोकभाषाई अभिव्‍यक्ति ही अंतत: सच्‍ची होती है। उसका किसी भाषा में अनुवाद आसान नहीं होता। मैं अपनी मैथिली कविताओं का अनुवाद ही ठीक ठीक नहीं कर पाता हूं - इसकी वजह ये है कि लिखने के लिए मैं दोनों भाषाएं उपयोग में लाता हूं और जब जिस भाषा में अंदर का आवेग फूटता है, उसमें लिखता हूं। ऐसा दूसरों के साथ भी होता होगा। हां, उनके साथ ये भी होता होगा कि वे अपनी एक भाषा के साहित्‍य को दूसरी भाषा में आसानी से ले आने में सक्षम होते होंगे। लेकिन महज अनुवाद कर देने और भाषाई स्रोत का जिक्र न करने की वजह से उन्‍हें बेईमान और यशोकामी बताना ठीक नहीं है। इसकी कई दूसरी वजहें भी हो सकती हैं।


            Monday at 6:09pm ·

          • Avinash Das दूसरी बात, मुझे छंद से खुद भी प्‍यार है। मैं खुद छंद में लिखता हूं। मैंने कई गीत लिखे हैं। लेकिन धूमिल की तरह यह भी मानता हूं कि निष्‍ठा का तुक विष्‍ठा से मिला देने मात्र से कविता कविता नहीं होती। उसके लिए संवेदना की ऊंची धरातल चाहिए, जो दुर्भाग्‍य से सुमन और अमर की परंपरा में हमें नहीं मिलती।
            Monday at 6:11pm ·

          • Ashish Anchinhar anuvad aasan nahi hota to iska kya matlab hain, ki use hindi ka maulik bata diya jae ? aur vazha koi bhi ho lakshy to yashokami hona hain
            Monday at 6:14pm ·

          • Avinash Das ‎@ Ashish Anchinhar : भाई, आप ही ये दावा कैसे कर सकते हैं कि कोई एक कृति कौन सी भाषा में मौलिक है... भले ही पहले वह मैथिली आ गयी, बाद में हिंदी में। यह भी तो हो सकता है कि वह सोची गयी हिंदी में हो। मौलिक सोचना है या लिखना?
            Monday at 6:16pm ·

          • Ashish Anchinhar janha tak chand ki baat hain, aap kachhe khiladi hain, matr dhoomil ka udaharn dene se koi jyani nahi hota hain, maan lijiye agar main koi do pankti yon likhta hoon-----aadmi ki nishtha ho gayi kutte ki vishtha , aab ye khiye ki kaun si khrabi hain?
            Monday at 6:25pm ·

          • Ashish Anchinhar Avinash Das-----aap ka khana sahi hain, maine jin lekhko ke upr ye aarop lagaya hain ve pahle sochte hindi me hain phir likhte hain dono bhashaon main.
            Monday at 6:27pm ·

          • Avinash Das यह सिर्फ तुकबंदी है आशीष जी। इसमें नारेबाजी है। निजी जीवनानुभव का मर्म नहीं। अगर है भी तो छलक कर पाठकों तक नहीं पहुंचता। संभव है, छंद के मामले में मैं कच्‍चा खिलाड़ी होऊं लेकिन एक पाठक के बतौर आप मुझे खारिज नहीं कर सकते।
            Monday at 6:27pm ·

          • Avinash Das यह भी आप दावे के साथ नहीं कह सकते कि वे पहले सोचते हिंदी में ही होंगे। अगर कह सकते हैं, इसका मतलब आपका ज्‍योतिष ज्ञान आपके साहित्‍य ज्ञान से ज्‍यादा मुखर है। आपको बधाई।
            Monday at 6:28pm ·

          • Ashish Anchinhar jyotish jyan koi aasman se tpka hua vastu nahi hain , vah matra anubhvo ki potli hain, aur main maithili sahity kopadha hain, uske marm ko jana hain, uski aatma se anubhv batoren hain tab jjar yah likha hain ki uprlikhit sahitykar pahle hindi main sochte hain phir dono bashaon me likhte hain
            Monday at 6:33pm ·

          • Avinash Das साहित्‍य का मर्म दुनिया की किसी भी भाषा में एक ही होता है... और अपने दावे पर इतना गुमान सेहत के लिए ठीक नहीं। लोग अहंकारी समझेंगे। आप कहेंगे, लोगों का काम है कहना। कहिए, लेकिन फिर भी थोड़ा दूसरों की समझदारी पर भरोसा करना चाहिए।
            Monday at 6:36pm ·

          • Ashish Anchinhar ye guman nahi hain, aur na hi anhakar hain, ye to bas atmvishvash hain, aur jnha tak tusron ke bharosa ki bat hain vah to ham barson se karte aayen hain.
            Monday at 6:39pm ·

          • Avinash Das ‎@ Ashish Anchinhar : आपके आत्‍मविश्‍वास की जय हो...
            Monday at 6:40pm ·

          • Ashish Anchinhar aur jay unki bhi ho jo is tarh ke kukarmo me rat logo ki paksh rakhte hain
            Monday at 6:42pm ·

          • Avinash Das जय जय
            Monday at 6:42pm ·

          • Avinash Das जब तर्क खोखले होते हैं, तो आरोपों की निजता सघन हो जाती है। इस मामले में हम दोनों कमीने हैं आशीष जी...
            Monday at 6:43pm ·

          • Shri Dharam bhai anchinhar jee aapke geeta- path men path kisi aur ka hai. kya aapne meri kahani 'brhamnyay' aur 'navjatak katha 'padhi hai? pahle padh lijiye fir baat karenge... jahan tak do bhasha men likkhne ka prashan hai lekhak swtantra hai ki vah 1 vishay men kitni bhasha aur kitni vidha men likhe. aapne harimohan jha ka nam kyon chod diya lagta hai hindi men khattar-kaka nahin padha hai. aapke fir ki pratiksha rahegi
            Monday at 6:45pm ·

          • Ashish Anchinhar ‎@shridharam--- haan padha hain usme harimohan jha ne shapasht likha hain ki khattr kaka ka avirvhav aaj se bis pasich ssal pahle hi maithili main ho gaya hain
            Monday at 6:47pm ·

          • Ashish Anchinhar Avinash Das-----aba aapne sahi kaha , vase bhi aapke khole tark to ham tabhi tekhe the jab aapne viyogi aur nagarjun ke alawa anay par baaat karne se mana kar diya tha .
            Monday at 6:49pm ·

          • Avinash Das आशीष जी, वहां खोखले तर्क का मामला नहीं था। वहां तथ्‍य का मामला था। आप अपनी आलोचकीय समझ में थोड़ी तरतीब ले आएं, तो बहुत अच्‍छा रहेगा।
            Monday at 6:51pm ·

          • Shri Dharam par harimohan jha ne use anuvad nahin kaha hai. aur nagarjun ne bhi sari baten likhi hain apne meri kahani ke bare men nahi bataya
            Monday at 6:54pm · · 1 person

          • Ashish Anchinhar tarteeb to main le hi aaya hoon bahi, magar vah to aap nahi dekh rahe hain
            Monday at 6:54pm ·

          • Shri Dharam anchinhar ji agar aap sahi maithili-saput hain to hindi men bolnne-likhane ka sappt khaiye.. main bhi maithili men likhna chod dunga
            Monday at 6:58pm · · 1 person

          • Shri Dharam ‎@anchinhaaar aap geeta kee kasam khakar kahiye ki meri dono kahani padhi hai aur donon 1 hi hai.
            Monday at 7:00pm · · 1 person

          • Ashish Anchinhar han maine kathadesh me prakashit aur desil bayna me prkashit dono kahani padhi hain,
            Monday at 7:03pm ·

          • Ashish Anchinhar geeta par hath rakh kar kasam khane vale kita sach aur kita jhooth bolte hain yah to jgzahir hain.
            Monday at 7:04pm ·

          • Shri Dharam dono men kya samanta hai???
            Monday at 7:04pm · · 1 person

          • Shri Dharam are jagat ka theka mat lijiye aap mainjan nahin apni bat ki jiye
            Monday at 7:07pm · · 1 person

          • Shri Dharam to fir dono kahani yahan kyo nahin rakhte, kamse kam pahala page hi scan kar yahan prastut kijiye
            Monday at 7:13pm · · 1 person

          • Subhash Chandra neek...
            Monday at 7:14pm · · 1 person

          • Shri Dharam purvagrah ke sath koi bahas nahin ho sakti hai aur na hi koopmanduk bankar. fatvebaji se kisi rachana ya rachnakar ka mulyankan nahin ho sakta
            Monday at 7:17pm · · 1 person

          • Shri Dharam ‎@anchinhar, aapko pata hai ki geeta par hath rakhne wale kitna jhooth bolte hai fir bhi aap geeta ko kot karte hai?
            Monday at 7:20pm · · 1 person

          • Subhash Chandra samagar padhal..... bujhna padait achhe je apne kono purvagrah aatha vaad vishes sa seho grasit chhi...... jadi apne ekhan dharik sab Sahitya Academey vijeta lekhak ke sahi mulayakan kari ta......
            Monday at 7:22pm · · 1 person

          • Umesh Mandal जौं सही बात कि‍यो बजै छथि‍ तँ हुनका पुर्वाग्रहसँ ग्रसि‍त कहि‍केँ नाकारैमे जतेक उर्जा खर्च करी तहि‍सँ नीक जे ओहि‍ सत्‍यक संग प्रगति‍शील वि‍चारधारक अनुकरन क' संग दि‍ऐ। आशीश जीक कहब मात्र एतबे नहि‍ छन्‍हि‍ जे जखन साहि‍त्‍य अकादमीकेँ अनुवाद पुरस्‍कार हेतु अलगसँ भारत सरकार द्वारा खर्च करबाक फन्‍ड छन्‍हिेँ तखन घरक देवताक पहि‍ल पूजा नहि‍ करैबलाकेँ गहबरक सि‍पाही रूपमे ठाढ़ क' क' जे मन होइ छन्‍हि‍ से करै छथि‍।
            Monday at 9:03pm · · 2 people

          • Umesh Mandal
            बात असलमे ई अछि‍ जे जखन एक भाषामे रचना कएल गेल तखन वएह रचना जौं दोसर भाषामे लि‍खल जाए आ तकरा अनुवादो नहि‍ कहि‍ मौलि‍कक रूपमे स्‍थान देल गेल तँ से कतेक उचि‍त आ वैज्ञानि‍क भेल। गामो-घरक लोक (जेकरा आइ तक अगुआएल लोक घास-पात बुझैत रहलाहेँ) ओकरो मुँहें सुनै छी- लोक छाड़ा फीड़ क' आगू मुँहें घुसकैए न कि‍ पाछू' । आशीष जीक जे बात छन्‍हि‍ जौं अझुको समैमे खामखा रंग वि‍रंग शब्‍दजालमे ओझरा क' नाकारल जाइए तँ से कमसँ कम पढ़ल-ि‍लखल लोक लेल नीक नहि‍। ई तँ सामंती संस्‍कारक बात भेल जे लेखक स्‍वतंत्र छथि‍ जे जेतेक भाषामे मन हेतनि‍ लि‍खताह। जबकि‍ इहो हमसभ बजै छी जे लेखक अपन मातृभाषामे सभसँ उत्‍कृष्‍ट रचना क' सकै छथि‍। तहन एतेक समस्‍या कि‍एक अछि।


            Monday at 9:16pm · · 1 person

          • Shri Dharam mandalji namaskar, anuvad aur mauliktak ki paribhasha?????????
            Monday at 9:31pm · · 1 person

          • Umesh Mandal हँ भाय सहाएब प्रणाम, उपरमे हम लि‍खलौं अछि‍ जे शब्‍दजाल, अहाँक प्रश्‍न ओकरे चक्‍कर काटि‍ रहल अछि‍। अहीं कहू जे अनुवादक की रूपरेखा। जौं दुनूक बीच कोनो भेद नहि‍ तखन.....।
            Monday at 10:01pm · · 2 people

          • Umesh Mandal हँ भाय सहाएब प्रणाम, उपरमे हम लि‍खलौं अछि‍ जे शब्‍दजाल, अहाँक प्रश्‍न ओकरे चक्‍कर काटि‍ रहल अछि‍। अहीं कहू जे अनुवादक की रूपरेखा। जौं दुनूक बीच कोनो भेद नहि‍ तखन.....।
            Monday at 10:01pm · · 1 person

          • Umesh Mandal हँ भाय सहाएब प्रणाम, उपरमे हम लि‍खलौं अछि‍ जे शब्‍दजाल, अहाँक प्रश्‍न ओकरे चक्‍कर काटि‍ रहल अछि‍। अहीं कहू जे अनुवादक की रूपरेखा। जौं दुनूक बीच कोनो भेद नहि‍ तखन.....।
            Monday at 10:01pm · · 1 person

          • Umesh Mandal हँ भाय सहाएब प्रणाम, उपरमे हम लि‍खलौं अछि‍ जे शब्‍दजाल, अहाँक प्रश्‍न ओकरे चक्‍कर काटि‍ रहल अछि‍। अहीं कहू जे अनुवादक की रूपरेखा। जौं दुनूक बीच कोनो भेद नहि‍ तखन.....।
            Monday at 10:01pm · · 2 people

          • Umesh Mandal हँ भाय सहाएब प्रणाम, उपरमे हम लि‍खलौं अछि‍ जे शब्‍दजाल, अहाँक प्रश्‍न ओकरे चक्‍कर काटि‍ रहल अछि‍। अहीं कहू जे अनुवादक की रूपरेखा। जौं दुनूक बीच कोनो भेद नहि‍ तखन.....।
            Monday at 10:01pm · · 2 people

          • Umesh Mandal हँ भाय सहाएब प्रणाम, उपरमे हम लि‍खलौं अछि‍ जे शब्‍दजाल, अहाँक प्रश्‍न ओकरे चक्‍कर काटि‍ रहल अछि‍। अहीं कहू जे अनुवादक की रूपरेखा। जौं दुनूक बीच कोनो भेद नहि‍ तखन.....।
            Monday at 10:01pm · · 1 person

          • Umesh Mandal हँ भाय सहाएब प्रणाम, उपरमे हम लि‍खलौं अछि‍ जे शब्‍दजाल, अहाँक प्रश्‍न ओकरे चक्‍कर काटि‍ रहल अछि‍। अहीं कहू जे अनुवादक की रूपरेखा। जौं दुनूक बीच कोनो भेद नहि‍ तखन.....।
            Monday at 10:01pm · · 1 person

          • Umesh Mandal हँ भाय सहाएब प्रणाम, उपरमे हम लि‍खलौं अछि‍ जे शब्‍दजाल, अहाँक प्रश्‍न ओकरे चक्‍कर काटि‍ रहल अछि‍। अहीं कहू जे अनुवादक की रूपरेखा। जौं दुनूक बीच कोनो भेद नहि‍ तखन.....।
            Monday at 10:01pm ·

          • Shri Dharam harimohan jhak khattarkaka (hindi) k bhumika son spast achi je jon rachanakar apn rachana ken srot bhashak sandarbhak anukul badlait chati ta o punarrachana thik
            Monday at 10:56pm · · 1 person

          • Vibha Rani
            bahut neek. je aai dharin maithili me nayi bhelai, se aai bh' rahal chhai. aasheesh ji ke ee lekh Hindi me likhbak jaroorati kiyaik padlai, sehe hamar chhot budhdhi me nayi aayal. dosar, Rakamal ya Nagarunaka prati ham ehen vichar rakhi, t' he maithilik devadhidev! ek ta laghghee se sabh ke kharij k' del jao. aab nav maithili sahity likhal jao. prashn chhai je kon katha kon bhasha me pahine likhal gelai, takar faisla ke karat? maithili me ya Hindi me pahine chhapi gene santa oo pahine maithili athva hindi ke bh' gelai, ekar nirnay ke karat? aa jakara bahas me aanand abait chhay, o karothu bahas. h


            Monday at 11:14pm · · 2 people

          • Vibha Rani
            bahas sarthak huaye t'budhdhik vistar hoit chhai. ehen bahas me t' je ek paai budhdhi achhi, seho hera jayat. chali, ham apan katha kahi ke baat samapt kari. buchchidai hamar maithili hindi dunoo me likhal katha achhi aa buchchee daik jeevan par aadharit naatak ke aadha hissa 'bimb-Pratibimb" hindi me chhai. bh' sakai chhai je buchcedai par ham kono kavito lilhi, t' aab okar vidha a bhasha par ghamarthan hebak chahi ki ohen samajikta par charcha je maithil samaj me ekhano stre ke buchchidai baneba me ham mahatvpoorn bhoomika nibha rahal chhi? rachnakar ek vishay par anek vidha aa anek bhasha me likhi sakai chhai aa sabh maulik bh' sakay chhai. ona ashish je ke badhai je hunaka etek pratikriya bheti rahal chhanhi. aab hunaka ekare sangarhit karake ek got pothi chhapa lebak chahi. ha, yadi kono prakashak maithili me muft chhapay lel bhet jay, t hamaro kahathu, hamro pandulipi taiyar chhai. maithili se hindi me jebak karan taku bhai lagani!


            Monday at 11:27pm · · 1 person

          • Mihir Kirti
            विभाजी, हिन्दी में भी कुछ गिने चुने लोग ही प्रकाशक पाते हैं, और सब खुद ही छपवाते हैं। डोगरी, कोंकणी, मणीपुरी; इन सभ भाषाओं में प्रकाशन की समस्या है, पर वहां के साहित्यकार इस बात का बहाना बनाकर हिन्दी और अपनी भाषा दोनों में मूल लेखन नहीं करते। अंग्रेजी में प्रतिदिन बीसों पाण्डुलिपि प्रकाशकों द्वारा रिजेक्ट की जाती है, आर.के नारायण और मुल्क राज आनन्द जैसे लेखकों को भी अपनी पुस्तक छपवाने में मसक्कत करनी पड़ी। श्रीधरम के कमेन्ट से मैं सहमत हूं, उनमें हिम्मत है, अपने लिए वे सन्दर्भ खोजते हैं; दोनों भाषा में मूल कहन की उनकी आकांक्षा नहीं; और राजकमल जी की चर्चा कहाँ से आपने ला दी! अभी भी देर नहीं हुई, मैथिली भाषा इसके कमजोर और ढुलमुल साहित्यकारों की वजह से मर रही थी, इसमें आ रहे जागति को पहचानें। मैथिली के अतिरिक्त और कोइ दूसरी भाषा आप देखती हैं जहाँ दो भाषाओं में एक ही चीज परोसने की सुविधा हो! आपने सच लिखा है, इसमें बहस का कोइ मुद्दा नहीं; यह तो आप सभी को स्पष्ट होना चाहिए था कि दो भाषाओं में बिना कॊमा, फुलस्टाप के एक ही रचना मौलिक नहीं हो सकती; यह सुविधा मात्र मैथिली के हिन्दी लेखकों को मिली हुई थी; अब बस और नहीं। दूसरी भाषा में तो यह बहस चल ही नहीं सकती, लोग हँसेंगे; या कॉमेडी समझेंगे। मैथिली को अपने अहसान तले नहीं दबायें, इतनी प्यारी भाषा को जीने का हक है। अपनी हिन्दी के किताब में आप मैथिली से अनूदित लिखने की शपथ लें और हमारा सर गर्व से ऊँचा रहने दें, और मैथिली के लोगों से यदि आपको घृणा है (मैथिली साहित्यकारों से घृणा करें, मैं नहीं रोकूँगा, लोगों से न करें) तो अपनी मैथिली की किताबों पर हिन्दी से अनूदित लिखें। पर मैं चाहूँगा कि आप अपनी हिन्दी किताब में मैथिली से अनूदित लिखेंगी तो आपका सम्मान न हिन्दी वाले कम करेंगे, वरन आपकी ईमानदारी के वो कायल हो जायेंगे; और मैथिली के लोग तो झूम उठेंगे; और इससे बुच्ची दाइ की समस्या और अच्छी तरह आप समझा सकेंगी।


            Yesterday at 12:23am · · 3 people

          • Ajit Azad bhamati hindi me nai chhapal chhaik...maithilik anuwad chhaik. hindi wala kitabak flap dekhu...spasht likhal chhaik. tahina haseena manzil seho dekhu.
            Yesterday at 12:55am · · 2 people

          • Ajit Azad halanki ehi kari me rajmohan jha, saketanand seho abait chhaith.
            Yesterday at 12:58am · · 2 people

          • Umesh Mandal आब फ्लेप सभ सोझा आओत तेकर इन्‍तजार अछि‍। जि‍नका लग उपलब्‍ध हुअए, पस्‍तुत क' सकै छथि‍। ऐ लेल अजि‍त भाय सेहो उपयुक्‍त भ' सकै छथि‍।
            Yesterday at 11:04am · · 2 people

          • Ashish Anchinhar bahas me aybak lel sabh gota ke dhanyvad, suruaat ant san kri, bahi azad ji, rajmohan aa sakaatanand jik suchi prastut karu anha jan pramanit hoyt tan hunko lokni ke galt manal jaet. ona hamra khushi achi je aab shitykar sabh apan -apan pothi par flap laga nirny kae rahl chti je i mool maithilik pothi achi, aano lekhk ke i swikar karkab chahi,
            Yesterday at 11:20am · · 2 people

          • Ashish Anchinhar Vibha Rani------hindi me likhne ka karn yah hain hain ki maithili ke is bdboo se kam se kam hindi aur anay bhartiy janta (jo hindi janta samjhta ho) us tak pahuchana hain.ham kisi lekhk ke vidha bhasha chunne keliye badhy nahi kar rhen hain, yah hamre note se bhi shpasht hain, magar ham is baat keliye kritsankalpit hain ki ek hi rchan ko koi bhi do bhashaon me prastut na karen
            Yesterday at 11:25am · · 2 people

          • Ashish Anchinhar ‎@shridharm-----bahi aapki dono kthon me kya smanta ya asmanta hain iske keliy ham "hilkor " patrika me pankaj parashr dwara lekh ham apne waal par pratut krenge jisje janta aur aap dekh sakenge ki isme kya smanta aur asmanta hain aur uske bad ham kathadesh aur desil byna ka mool bhi yahan rakhenge.
            Yesterday at 11:27am · · 2 people

          • Ashish Anchinhar ek chij aur jis tarh sridharm ne apne bachav keliye is manch par aakr apni bbat rakhi hain vah achha hain, kam se kam kisi sahitykar ne to yah sahas dikhaya. magar main yahaha par yha khna chhuga ki agar hmare purvaj ne galti kiya to kya ham bhi galat karenge? bahi sreedharm , sahitykar ke jis pidhi me aap aate hain, hamse pahle aap hi is glti ko samaj ke samne laate? phir bhi sach aapne swikar kiya iske liye dhanyvad.
            Yesterday at 11:34am · · 2 people

          • Ashish Anchinhar bahi--- mihirkirti ji, call centre ki kathin job se samay nikal kr aap is bahas m e aayen iske liye dhanyvad.
            Yesterday at 11:35am · · 2 people

          • Ashish Anchinhar
            हसीना मंजिल: अजित आजाद के लिए: ललित सुरजन का लेख: मुझे जब भी अवसर मिलता है मेरी कोशिश होती है कि ऐसे रचनाकारों को पढ़ा जाए जो साहित्यिक चर्चाओं के केन्द्र में नहीं हैं। मैं यहां सिर्फ उनकी बात कर रहा हूं जिनकी लेखनी में सचमुच कुछ शक्ति हैऽ लेकिन जो इस रूप में अशक्त हैं कि अपनी चर्चा स्वयं कराने का गुण उन्हें नहीं आता। एक नाम मैं 'विस्फोट' कहानी संग्रह के लेखक रामनिहोर विमल का ले सकता हूं। उनकी कहानियां दलित समाज की दु:सह्य पीड़ा को अपेक्षित कलात्मकता के साथ बयान करती है। मैं दूसरा नाम झारखंड के कहानीकार कालेश्वर का ले सकता हूं जिनकी कहानियों में भूमंडलीकरण के प्रभाव से तहस-नहस हो रही सामाजिक संरचना का प्रमाणिक दस्तावेज मिलता है। कुछ समय पहले मुझे उषा किरण खान का उपन्यास 'हसीना मंजिल' पढ़ने का अवसर मिला। पांच वर्ष पूर्व प्रकाशित इस उपन्यास पर अब तक चर्चा क्यों नहीं हुई कि इसलिए कि उषा किरण खान का नाम अनजाना नहीं है। वे संभवत: पिछले चार दशक से लेखन कर रही हैं तथा एक समय हिन्दी की सभी प्रमुख पत्रिकाओं में हमने उनकी रचनाएं प्रकाशित होती देखी हैं।
            मुझे 'हसीना मंजिल' पर थोड़े विस्तार के साथ बात करना इसलिए जरूरी लग रहा है कि इसमें लेखिका ने एकदम से एक नया विषय उठाया है। हृदयेश के उपन्यास 'किस्सा हवेली का' से इसकी एक संदर्भ में तुलना की जा सकती है। हृदयेश ने उपन्यास में अपने परिवेश का अतिक्रमण करते हुए एक नितांत नए परिवेश में झांकते हुए उसे समझने की कोशिश की है। वे संभवत: एक मात्र गैर दलित लेखक हैं जो दलितों की बस्ती में जाने का साहस जुटा सके। इसी तरह उषाकिरण खान ने बिहार के मुस्लिम समुदाय के भी एक छोटे से वर्ग चूड़ीहार समाज के जीवन के विविध आयामों का चित्रण गहरी संवेदना के साथ इस उपन्यास में किया है। नायिका सकीना एक छोटे से गांव में रहकर लाख की चूड़ियां बनाती और बेचती है। कथा का ताना-बाना उसके इर्द-गिर्द ही बुना गया है, लेकिन यह विस्तार लेकर एक पूरे समाज की कथा बन जाती है। इसमें देश के बंटवारे की पीड़ा है, बदलते दौर में मशीनों के आ जाने से हस्तशिल्प के बर्बाद हो जाने की व्यथा है, गांव-जवार में सामाजिक संबंधों के जुड़ने-निभने की दास्तान है, और है नारी मन की उमड़ती-घुमड़ती वेदना। मुझे इस लघु उपन्यास ने पहिले तो विषय के अनूठेपन के कारण आकर्षित किया और फिर विषय के प्रति लेखिका के सहानुभूतिपूर्ण उपचार के कारण प्रभावित। इसे पढ़ते हुए बार-बार ध्यान आता रहा कि हमारे आसपास अंतहीन मुद्दे बिखरे हुए हैं, लेकिन उन पर लेखकों की दृष्टि कम ही ठहर पाती है। उषाकिरण खान ने एक नई ामीन तोड़ी और उसे भलीभांति कथारूप में सामने रखा, इसके लिए वे हमारी बधाई की हकदार हैं। ऐसी रचनाएं और भी लिखी जा रही होंगी। उन पर साहित्य संसार में विधिवत् चर्चा होगी तो लेखकों का उत्साह भी बढ़ेगा व पाठकों को भी कुछ नया मिलने का रुचिकर संतोष होगा।


            Yesterday at 1:15pm · · 3 people

          • Ashish Anchinhar भाइ अविनाश के लिए: तारानन्द वियोगी: तारानन्द वियोगी के कर्मधारय का बैक फ्लैप- "यह पाया तो क्या पाया?" जिसके मैथिली अनुवाद "ई भेटल त की भेटल को " मैथिली अनुवाद पुरस्कार" सॉरी- मैथिली मूल रचना बाल साहित्य पुरस्कार दिया गया।http://www.facebook.com/photo.php?fbid=205267559498566&set=a.205267119498610.57287.100000459693390&theater
            Yesterday at 1:18pm · · 2 people

          • Ashish Anchinhar
            भाइ अजित आजाद के लिए: हिन्दी उपन्यास: रमेश खत्री:हिन्दी साहित्य: एक साहित्यिक आकलन वर्ष 2010’ उपन्यास
            उपन्यास ऐसी गद्य विधा है जिसमें जीवन के उतार चढ़ाव देखने को मिलते हैं । और जीवन की समग्रता को नजदीक से देखने का प्रयास किया जाता है । कश्मीर की पृष्ठभूमि पर मनीषा कुलश्रेष्ठ का ‘शिगाफ’ तमिलनाडू की पृष्ठभूमि पर तेजिंदर का ‘सीढ़ियों पर चीता’ महानगर मंमबई की चमक दमक की परते उधेड़ता रवीन्द्र कालिया का ‘17 रानाडे रोड़ आया । ‘पानी बीच मीन पियासी’ मिथिलेश्वर का, ‘दासी की दास्तान’ में विजयदान देथा राजस्थान की लोककथा को आधार बनाते हैं । सुरेन्द्र वर्मा ‘काटना शमी का वृक्ष पद्मपंखुरी की धार से’ आया जिसमें सांस्कृतिक विघटन की कथा निहित है । रवीन्द्र वर्मा का ‘क्रांति कक्का की जन्म शताब्दी’ मध्यमवर्गीय मुस्लीम परविार की कर्ह पीढ़ीयों की जीवन गाथा प्रस्तुत करता है । विनोद कुमार श्रीवास्तव का ‘वजह बेगानगी नहीं मालूम’ आया । इसने हमारे सम्मुख उस समय की परतों को खोला जब हम सांप्रदायिक सोहाद्र्र सें विलगित हुए । विद्यासागर नौटियाल ‘स्वर्ग दद्दा! पाणी पाणी ’ मिलिन्द बोकिल का ‘समन्दर’, विजय शर्मा का ‘दिमाग में घोंसले’, विष्णु चन्द्र शर्मा का ‘रेखाएं दुख की’, पंकज सुबीर का ‘ये वो सहर तो नहीं’, कुणाल सिंह का ‘आदिग्राम उपाख्यान’, सुषम बेदी का ‘मैंने नाता तोड़ा’ विकास झा का ‘मैंकलुस्कीगंज’, राजनारायण बोहरे का ‘मुखबीर’ प्रमुख हैं । इसी तरह उपन्यास लेखन में महिला लेखिकों ने भी इस वर्ष अपनी अच्छी खासी उपस्थिति दर्ज की है जिनमें प्रमुख हैं संतोष श्रीवास्तव का ‘टेम्स की सरगम’, सिमी हर्षिता का ‘जलतरंग’, सुधा अरोड़ा का ‘यहीं कहीं घर था’, शुभा वर्मा का ‘कृतिका’, नीरजा माधव का ‘ईहामृग’, मीराकान्त का ‘एक कोई था कहीं नहीं सा’, उषा किरण खान का ‘भामती’ कमल कुमार के दो उपन्यास आये ‘पासवर्ड’, ‘मैं घुमर नाचूं’ आदि प्रमुख हैं । इन उपन्यासों की विषयवस्तु बिल्कुल अलग और प्रयोगों को साधते हुए हमारे सम्मुख खुलती है ।


            Yesterday at 1:22pm · · 2 people

          • Ashish Anchinhar
            ऊपर के आलेख से स्पष्ट है कि भामती हिन्दी उपन्यास है। फिर भी यदि फ्लैप बदल कर अपनी गलती को उषा किरण जी या अन्य साहित्यकार अपनी गलती का सुधार करते है तो इससे ज्यादा खुशी की क्या बात है, जिस लेखक ने श्रीधरम पर आरोप लगाया है (पंकज पराशर) वो तो दूसरे की रचनाओं को अपने नाम से छपवाता है, इसलिए किसी लेखक द्वारा अपनी रचना का अनुवाद या पुनर्लेखन करने पर उँगली उठाने का उसको नैतिक अधिकार नहीं है। मैँ तो श्रीधरम जी का (और विभाजी का भी)कायल हो गया हूँ, उनमेँ ये हिम्मत है कि स्वयँ आगे आए हँ, दूसरे लेखकोँ की तरह नहीँ जिन्होँने अपने पालतू शिष्योँ के माध्यम से इस बहसमेँ हिस्सा लिया। एक बात और, लेखक हार्ड बाउंड में फ्लैप चेंज कर अपनी गलती सुधार सकते हैं, पेपरबैकमे पतला फ्लैप चढाकर भी गलती सुधारी जा सकती है। जय मिथिला. जय मैथिली।


            Yesterday at 1:30pm · · 3 people

          • Vinit Utpal श्रीधरम जी, हमर राय ई जे अहां पर जे आरोप लागल आइछ एकरा अहां खत्म क दियो. दुनू कहानी ते अपने लग हेबे करत. दोनों कहानी पाठक के आगू राखि दियो. हाथ कंगन के आरसी कि. सबहक मुंह बंद भ जाईत.
            Yesterday at 2:37pm · · 3 people

          • Ashish Anchinhar भाइ श्रीधरम, हरिमोहन झाकेँ कोट केलाक संग ईहो तँ कहि दितिऐ जे नूतन अनुवाद सिद्धांत में शाब्दिक अनुवादक स्थान भावात्मक पुनर्लेखनात्मक अनुवाद ल' लेने अछि।
            Yesterday at 3:11pm · · 2 people

          • Shri Dharam bhai anhinhar aapko pankaj parashar jaise choor ke sandarv ko lene se pahle 10 bar sochana chahiye tha.main jaldi hi navjat(k)tha bhi uplabdh karvaunga. rahi bat mudde ki to ispar main apna mat vistar se likhunga. aur han anuvad, bhavanuvad aur punarchana men bahut antar hota hai. tab tak aap nagarjun ka novel NAYEE PAUDH1953 aur NAVTURIYA 1954 PADHIYE .... HINDI MEN 21 ADDHAY hain aur maithili men 19 addhyay hai. baki andh kshetriyvad ya rastravad ke andhtarkon se bahas men kuch nahi milega.
            19 hours ago · · 4 people

          • Shri Dharam aur han main apni sari kahaniyon ki janam -patri bhi aapko saunp dunga
            19 hours ago · · 2 people

          • Umesh Mandal मि‍थलामे एकटा कहबी छै- चोर-चोर मसि‍यौत भाए। मसि‍यौतक साक्ष्‍य मान करैमे कोनो सोचे-वि‍चारैक खगता हमरा बुझने नै हेबक चाही।
            10 hours ago · · 1 person

          • Ashish Anchinhar
            भाई: अविनाश के लिए: भाई अविनाश के लिए: http://www.facebook.com/photo.php?fbid=205541746137814&set=a.205267119498610.57287.100000459693390&theater दलित तारानन्द वियोगी: यात्री (हिन्दी के नागार्जुन) की जीवनी में वियोगी जी जे बाबा के बहाने आत्मप्रशंसा में पूरी तागत लगा दी है, और पूरे किताब में उन्होंने स्वयं को दीन-हीन दलित कहाहै, जबकि सबको पता है कि वे जमीन्दार हैं और उन्होंने या उनके पिता ने कभी हल कुदाल और खुरपी भी नहीं छुआ। वैसे भी वे जाति से भी दलित नहीं हैं , हिन्दी अनुवाद करते वक्त अविनाश आपने यह तथ्य हिन्दी के पाठकों से क्यों छुपाया? ये तो दलित का नकली प्रमाणपत्र बनाकर दलितों के लिए आरक्षित किए नौकरी को हड़पने के समान नहीं। आपका उत्तर मैं जानता हूँ, आप दलित की नई परिभाषा ढूढेंगे, कोट करेंगे- परंतु दलित तो एक पारिभाषिक शब्दावली है, और वियोगी जी तो सरकारी अफसर हैं, उन्होंने फिर भी इस शब्दावली का गलत इस्तेमाल अनजाने में किया ऐसा आप मान सकते हैं, बात चली है तो दूर तलक जाएगी...हिन्दी के पाठको के लिए ये जानकारी आप कब तक रोक सकते हैं ।


            about an hour ago ·

          • Ashish Anchinhar
            भाइ श्रीधरम के लिए नयी पौध का पहला पन्ना: अनुवाव...पुनर्लेखन...!!! http://www.facebook.com/photo.php?fbid=205539009471421&set=a.205267119498610.57287.100000459693390&theater भाइ श्रीधरम के लिए नयी पौध का अंतिम पन्ना: अनुवाद...पुनर्लेखन...!!! http://www.facebook.com/photo.php?fbid=205539219471400&set=a.205267119498610.57287.100000459693390&theater भाइ श्रीधरम के लिए नवतुरिया का पहला पन्ना: अनुवाद...पुनर्लेखन...!!! http://www.facebook.com/photo.php?fbid=205539852804670&set=a.205267119498610.57287.100000459693390&theater भाइ श्रीधरम के लिए नवतुरिया का अंतिम पन्ना: अनुवाद...पुनर्लेखन...!!! http://www.facebook.com/photo.php?fbid=205539916137997&set=a.205267119498610.57287.100000459693390&theater भाइ श्रीधरम के लिए बलचनमा (हिन्दी अनुवाद) का पहला पन्ना: अनुवाद...पुनर्लेखन...!!! http://www.facebook.com/photo.php?fbid=205540002804655&set=a.205267119498610.57287.100000459693390&theater भाइ श्रीधरम के लिए बलचनमा (हिन्दी अनुवाद) का अंतिम पन्ना: अनुवाद...पुनर्लेखन...!!! http://www.facebook.com/photo.php?fbid=205540059471316&set=a.205267119498610.57287.100000459693390&theater भाइ श्रीधरम के लिए बलचनमा (मूल मैथिली) का पहला पन्ना: अनुवाद...पुनर्लेखन...!!! http://www.facebook.com/photo.php?fbid=205540272804628&set=a.205267119498610.57287.100000459693390&theater भाइ श्रीधरम के लिए बलचनमा (मूल मैथिली) का अंतिम पन्ना: अनुवाद...पुनर्लेखन...!!! http://www.facebook.com/photo.php?fbid=205546362804019&set=a.205267119498610.57287.100000459693390&theater


            59 minutes ago · · 1 person

          • Ashish Anchinhar भाई श्रीधरम, हरिमोहन झा में ही साहस था कि वे हिन्दी के खट्टर काका के मैथिली मे पहले हुए अवतरण की बात कह सकते थे, वैसे भी नयी पौध में नागार्जुन ने हिन्दी के हर संस्करण में इसके पुनर्लेखन की बात कही है और हिन्दी में भी 21 से 20 अध्याय हो गया- तो इन दोनों संस्करण को दू मौलिक (हिन्दी की दो मौलिक) कृति मानें)? मूल मैथिली से हिन्दी में पुनर्लेखन (यदि अनुवाद शब्द पर आपको आपत्ति है तो) या मूल हिन्दी से मैथिली में पुनर्लेखन लिख देने के लिए हरिमोहन झा जैसी दृष्टि चाहिए...
            53 minutes ago · · 1 person


            • Shri Dharam to aapki drishti men nagarjun drishti-heen the?
              about an hour ago · · 1 person

            • Ashish Anchinhar
              यात्री एक महान कवि और उपन्यासकार थे, पर उनसे एक चूक हो गई, बलचनमा के बारे मे उन्होंने स्पष्ट कहा कि यह उनकी रचना मैथिली में है, पर उनके सपूत शोभाकान्त ने उनके मृत्यु के बाद कह दिया कि उनके पिता ने यह झूठ राम विलास शर्मा के पत्र के जवाब को सुदृढ़ बनाने के लिए दिया था। हा दैव.. वैसे उनके सुपुत्र ही क्यो बहुत सारे मौकापरस्त उनके नाम को बेचने में लगए हुए हैं, विद्यापति को बेचते बेचते अब उनकी भूख बढ़ गई है शायद... यो जमीन्दार अपनी जमीन की शिलिंग बचाने के लिए कम्यूनिस्ट बने वो उनके साथ खिचवाये फोटो को लेकर घूम रहे हैं, जिन्होंने नारीपर- दलितपर अत्याचार किया वो नारीवादी और दलित लेखक बने हुए हैं और हा बाबा..हा बाबा कर रहे हैं...बाबा के आदर्शो और दृष्टिकोण को आपके या उन दलित अत्याचारियों/ नारी अत्याचारियों के सर्टिफिकेट की जरूरत नहीं है...आपके लिए कुछ लिंक ऊपर में मैने पेस्ट किया है, निर्णय लें कि ब्रह्मन्याय का पुनर्लेखन नवजातक कथा है या नवजातक कथा का पुनर्लेखन ्ब्रह्मन्याय...क्योंकि अनुवाद शब्द से आपको विरक्ति है तो पुनर्लेखन ही सही।


              57 minutes ago ·

            • Ashish Anchinhar मैथिली विकिलीक्स अब अपने साइट पर...धन्यवाद प्रशान्त http://ashantprashant.blogspot.com/

             



            • Ashish Jha
              मैथि‍ली में रचना का अभाव रहा है और उससे भी अधि‍क अभाव आलोचना का रहा है,मैथि‍ली मे आलोचना करने का अधि‍कार भी कुछ लोगों ने अपनी जेब में ले रखा है, वे कि‍सी की आलोचना कर सकते हैं,लेकि‍न जब उनकी ओचना होती है तो अपनी औकात बताने लगते है, गीता और रामायण सामने रख देते हैं, जहां तक बाबा का सवाल है तो बाबा ने कभी झूठ नहीं बोला, अपने बेटों के बारे में उनकी क्‍या सोच थी यह बहुत लोग जानते हैं, अंति‍म दि‍नों में मैं भी उनके करीब था और आखरी सांस के समय भी वहीं बैठा था, यहां जो सवाल उठा है वो मौलि‍कता को लेकर है, मेरा मानना है कि‍ आज लोग मैथि‍ली के रास्‍ते हि‍न्‍दी के मंच पर चढने को इतने आतुर हो चके हैं कि‍ वे इन मुद़दों पर बहस करने से ही कतरा रहे हैं,मैं दावे के साथ तो नहीं लेकि‍न इतना जरूर जानता हूं कि‍ बाबा ने मूल रचना से कभी इनकार नहीं कि‍या, हां हि‍न्‍दी की पुस्‍तक में उसका उल्‍लेख नहीं हो सका, लेकि‍न बाबा के अलावा जो नाम और तथ्‍य सामने आ रहे हैं वो बता रहा है कि‍ मैथि‍ली साहि‍त्‍य कि‍स दौर से गुजर रही है, हाल ही मैं मैथि‍ली में योगदान के लि‍ए सोमदेव को एक लाख का परस्‍कार दि‍या गया था अब उस रकम से वे अपनी हि‍न्‍दी पुस्‍तक छपवा रहे हैं, सवाल मैथि‍ली के मंच पर हि‍न्‍दी के घ्‍


              about an hour ago · · 1 person
            • Ashish Anchinhar
              ajit आजादजी हसीना मंजिल फ्लैप आ कॉपीराइट पेज अहाँक लेल, अहाँ लिखने रही जे ओइ पर मैथिली से अनूदित लिखल छै, मुदा ओइपर तँ हिन्दी लिखल छै, बैक इनरपर। हसीना मंजिल-1 http://www.facebook.com/photo.php?fbid=205746902783965&set=a.205267119498610.57287.100000459693390&theater हसीना मंजिल-2 http://www.facebook.com/photo.php?fbid=205746946117294&set=a.205267119498610.57287.100000459693390&theater हसीना मंजिल-3 http://www.facebook.com/photo.php?fbid=205747572783898&set=a.205267119498610.57287.100000459693390&theater हसीना मंजिल-4 http://www.facebook.com/photo.php?fbid=205747079450614&set=a.205267119498610.57287.100000459693390&theater हसीना मंजिल-5 http://www.facebook.com/photo.php?fbid=205747102783945&set=a.205267119498610.57287.100000459693390&theater
              18 minutes ago ·

            • Ashish Anchinhar ajit azad ji,sanghi sang-apne dwara rajmohan aa saketanand ke je bich me anliyanhi achi takr suchi kanha achi? ki matra vytigat dushmani lel ehi manch par ehi lokni ke aanab katek uchit? ee link dekhoo http://www.facebook.com/photo.php?fbid=205589236133065&set=a.205267119498610.57287.100000459693390&theater

             



            • Ashish Anchinhar bahi anha kahne rahi je flap change nahi bhel chiak, aab ham delhun achi delhu aa ekhne saketanad ji ke samad hamra mobile par aael achi je o ekhn kaj me lipt nahi chnhi azad ji sahityik rangdari ke hamr charitr hanan kae rahl chthi o aab praman mangi rahl chti, jinka jaruri bujhae o apn mobile no. ehi tahm likhathi ham o samad forward kaebaik

             



            • Shiv Kumar Jha

              आशीषजी का प्रमाण मैथिली साहित्य के लिए खुशी और दुख दोनो ला रहा है। दुख इन अभागे लेखको और उनके दलालो के लिए, और खुशी कि भविष्यमे इस तरह का दुराग्रह ये और इनके चेले चमचे नही करेगे। अजित आजाद का साकेतानन्द और राजमोहन झा जैसे मैथिली के प्रति समर्पित सिद्धहस्त साहित्यकारो पर आरोप लगाना यही सिद्ध करता है कि जब मैथिली पर इतना गम्भीर बहस चल रहा है वे अपने स्वार्थ और ईर्ष्या की रोटी सेकने मे लगे हुए है। विभाजी का ये कहना कि उनकी रचनाएं दो भाषाओं में मौलिक हैं बहस को नहीं समझने और गलती को नहीं मानने का उनका हठ है और कुछ नहीं।अभी भी देर नहीं हुई, श्रीधरम जी और विभाजी, आपपर अपनी ही रचना का पुनर्लेखन करने का आरोप है जो सच में कोइ आरोप ही नहीं,. आप दोनों स्वयं स्पष्ट करें की मूल किस भाषा में आप अपनी रचनाओं को कहलवाना चाहते हैं, और विवाद खतम करें, अन्य लेखक तो पीठ पीछे वार करने में लगे हुए हैं उनसे तो हमें कोइ आशा ही नहीं। मैथिली का ये दुर्भाग्य रहा है कि हिन्दी से रिजेक्ट किए लोग यहां साहित्यिक रंगदारी कर रहे हैं, और इस रंगदारी से प्राइज ले रहे हैं। जहां तक मैथिलों में हिन्दी लिखने की की प्रवृत्ति रही है उसमें रामधारी सिंह दिनकर, फणीश्वर नाथ रेणु, आरसी प्रसाद सिंह, नागार्जुन, पोद्दार रामावतार अरुण, डॉ.हरिवंश तरुण, रामवक्ष बेनीपुरी, जनार्दन प्रसाद झा द्विज, रमाकान्त पाठक , बुद्धिनाथ मिश्र, राजदेव मंडल, राजकमल प्रमुख हं, परन्तु इन्होंने कभी मैथिली को अपनी सीढ़ी नहीं बनाया, पुरस्कार के लिए या अन्य किसी लाभ के लिए, परन्तु इन्होंने मिथिला और मैथिली की अन्य तरीकों से मदद की। यात्री को तो उनके संतान शोभाकान्त और और उनके जीवनी और संस्मरण लिखने वालों ने बेचनी का षडयंत्र किया है और अपनी गलतियों के लिए उन्हें बचाने वाला ढाल बना लिया है।


              21 minutes ago · · 1 person

            • Shiv Kumar Jha
              मेरे पिता कालीकान्त झा बूच ने अपने साहित्यिक जीवन की सुरुआत हिन्दी पद्य से किया था लेकिन मैथिली कवि फजलुर रहमान हासमी के आग्रह पर मैथिली में उन्होंने कविता लिखना शुरू किया और फिर उन्होंने हिन्दी में कभी नहीं लिखा, परन्तु --प्रत्यक्षं किम प्रमाणम---परन्तु कुछ छद्म स्वार्थ लोलुप मैथिली साहित्यकारों (तत्वों) के कारण उन्हें अपने जीवन के अन्तिम क्षणों मे वेदना का अनुभव करना पड़ा, ऐसे तत्वों (छद्म साहित्यकारों) को बेनकाब करने के लिए आशीष जी को धन्यवाद मात्र कहना काफी नहीं होगा.. परन्तु धन्यवाद। परन्तु आशीष जी ऐसे लोगों के पीछे जाकर अपना और समय बर्बाद न करें कारण अभी हमें उन राहों पर जाना है जिसके आगे राह नहीं है, ये लोग "सगर राति दीप जरए" में भी और नवारम्भ- त्रिकालज्ञ छद्मनाम से भी गाली गलौज पर उतर आते हैं। परन्तु एक बार फिर धन्यवाद...


              12 minutes ago · · 1 person

            • Shiv Kumar Jha बूच जी की पंक्ति उद्धत है- : हरण भऽ रहल अछि हमर मीठ बएना, कोना क’ सिखत आन बोली ई मैना- विवश अछि वधिक हाथसँ ठोढ़ तागल, अहीं टा पड़ल छी उठू औ अभागल।
              • Umesh Mandal हमरा तँ आब पुरा वि‍श्वास भ' रहल अछि‍ जे साहि‍त्‍य अकादेमीसँ 22सो भाषामे भामती आ ई भेटल तँ की भेटलकेँ अनुवाद अवश्‍य होएत.........
                8 hours ago ·  ·  3 people

              • Shri Dharam anchinhar aur parasar do no mitra navjatak katha padhiye
                2 hours ago ·  ·  2 people

              • Shri Dharam upar link dekhu...
                2 hours ago ·  ·  2 people


                • Vinit Utpal
                  श्रीधरम जी, कभी रमण कुमार सिंह ने पंकज पराशर के लिए कविता लिखी थी. उसमे लिखा था कि आपने किसी का क्या चुराया है जो आपको नींद नहीं आती है. अब आप खुद देख लें कि उन्होंने कहाँ से क्या-क्या चुराया था और झूठ की बातें गढ़-गढ़ कर लेख तो लिखा है, आज अलीगढ मुस्लिम विश्व विद्यालय में पढ़ा रहे हैं. एक ओर पराशर जहां वियोगी की कहानी संग्रह में वियोगी जी की ऐसी-तैसी करते हैं वहीं वियोगीजी उन्हें चोर समीक्षक का प्रमाणपत्र तो देते हैं लेकिन चोर कवि न होने की वकालत करते हैं. और तो और मैथिली-भोजपुरी अकादमी के कवि सम्मलेन में अपने बगल में खड़ा कर अविनाशजी उनकी पीठ थप-थपाते दिख जाते हैं. नेशनल बुक ट्रस्ट से प्रकाशित गंगेश गुंजन द्वारा सम्पादित कविता संग्रह का उन्होंने कैसे हिन्दी अनुवाद किया है, उसकी जानकारी आप गंगेश गुंजन जी या देवशंकर नवीन जी से ले सकते हैं. न हो तो अविनाशजी से यहीं ऊपर अपनी बात रखी है की उनकी कविता की आत्मा मर गई. पंकज पराशर ने जिस तरह आपकी लिखी हिन्दी और मैथिली कहानी को अनवाद बताया और आप पर आरोप गढ़े, इसकी भर्त्सना सभी मैथिली प्रेमी को करनी चाहिए. और जो भी लोग पंकज पराशर को तवज्जो से उनकी भी एक मत से भर्त्सना की जानी चाहिए. साथ ही तारानंद वियोगी जी को खुलेआम माफ़ी मांगनी चाहिए जो उन्होंने पंकज पराशर की तरफदारी में एक लेख का एक पाराग्राफ़ लिख डाला था.
                  Yesterday at 6:14pm · · 3 people

                • Shri Dharam
                  ‎@ anchinhar aapne sahi likha hai..लेकर घूम रहे हैं, जिन्होंने नारीपर- दलितपर अत्याचार किया वो नारीवादी और दलित लेखक बने हुए हैं और हा बाबा..हा बाबा कर रहे हैं...बाबा के आदर्शो और दृष्टिकोण को आपके या उन दलित अत्याचारियों/ नारी अत्याचारियों के सर्टिफिकेट की जरूरत नहीं है...आपके लिए कुछ लिंक ऊपर में मैने पेस्ट किया है, निर्णय लें कि ब्रह्मन्याय का पुनर्लेखन नवजातक है या नवजातक कथा का पुनर्लेखन ्ब्रह्मन्याय...क्योंकि अनुवाद शब्द से आपको विरक्ति है तो पुनर्लेखन ही सही....upar navjatak katha ki link hai dono kahaniyon ko padhakar khud aur parasar ke gal par thappad mariye.. ab mujhe pata chal gaya hai aap namanusar frastu hain .
                  Yesterday at 6:18pm · · 2 people

                • Shri Dharam ‎@Vinit Utpal jee, ye log bahas ko pani par tel jaise failana chahte hain... aur sandarbhheen bat karte hain. main fir duhraunga ki anuvad aur punarlekhan men main antar manta hun. maine bhi kuch rachnao ka punarlekhan kiya hai. aur maithili se aaj tak 1 paisa bhi dihari nahai mili hai. khair yaha bahas jab pahle apradhi man hi liya gaya to fir kya kaha ja sakta hai. main fir yaha nahin aaunga. aage kahin aur vistar se bat hogi..
                  Yesterday at 6:32pm · · 3 people

                • Ashish Anchinhar ‎@sreedharamjee maithili me sampadakji ko agale edition me hindi katha se punarlekhan likh dene se aapka samman ghat nahi jayega, vaise bhi jis bhasha me dihari nahi milti usme kuch bhi parosa jaye ye mai sahmat nahin, parantu aap is bahas me imandari se aaye uske liye dhanyavad, anya log to svayam dvara anudit ko bhi doosre bhasha me maulik hi man rahe hain.
                  23 hours ago · · 2 people


            navarambh me likhal aalekh humar nai chhi...o lekhak ekhno jivit chhaith aa khoob likhi rahal chhith. jinka made ohi alekh me likhal gel chhain tinka sabh ke pata chhain je o kinkar aalekh chhaik. ehutham ahank jankari aa hamra prati ahank bhasha evam visheshan purvagrah se grashit achhi. rahal baat dwij jait ke ta se hum jait-pait me yakin nai karai chhi. ahan kon durvyavharak baat karai chhi...ki katha goshthi ekar anumati dait chhaik...ki aan lekhak aa adhyaksh otay nai hoit chhathin...ki hum satte etek kalami lok...bhai...ee sabta aarop galat achhi...
            17 hours ago · · · See Friendship

          • You and Ashish Anchinhar like this.

          • Ashish Anchinhar anha klami lok nahi muda manabe chahait chiek duniya san
            7 hours ago · · 2 people

          • Ashish Anchinhar navarambh me likhal aalekh kakar chhi???jinka made oi lekh me likhal gel achhi tinka sabh ahan kakar naam kahne chhiyanhi??? ahan navarambh ke sampadak chhi aaki seho nai chhi??? trikalagya va kono chhadmnam se ahank patrika me kiyo chhapbaiye te takar jimmedari sampadak ajit azad ke chhanhi? dosra ke badnam kay ke kichhu nai hoyat ajit babu!!! apan likhlaha par tikoo??? ...
            27 minutes ago · · 2 people


          • trikalagya_prasiddha_ajitazad_navarambha-4 श्रीमान त्रिकालज्ञ अर्थात अजित आजादजी, अच्छी भाषा प्रयुक्त करने का आपका आग्रह सुनने में अच्छा है पर आपके द्वारा सुपौल कथा गोष्ठी और अन्य जगह गएर द्विज जाति के मैथिली साहित्यकारों के साथ किया दुर्व्यवहार क्या था? और त्रिकालज्ञ छद्मनाम से मैथिली के लगभग सभी साहित्यकारों को आपने जो मैथिली में आपके द्वारा सम्पादित नवारम्भ पत्रिका में गालियों की बौछार की है वो क्या मेरी भाषा से अच्छी है? भाइ मेरे, हिम्मत थी तो त्रिकालज्ञ उर्फ अजित आजाद तो लिख देते। ...

            56 minutes ago · · · Share
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            • Sonu Mishra आदरणीय आशिष भाई आखिर अहा कह कि चाहैत छि जहा तक अजीत आजाद के हम जनैत छियैन.......मैथिली लेखक मे हुनक स्थान शीर्ष छैन......रहल बात हुनक कोनो लेख के त ओकरा कने सकारात्मक ढंग स जरुर पढियौ......
              20 hours ago · · 2 people

            • Ashish Anchinhar
              भाइ सोनू, सकारात्मक रूपे दोबारा पढलौ, मुदा किसुनजी, महाप्रकाश, विनोदक, चन्द्रेश, विभूति, प्रदीप बिहारी, रमेश, शिव नीरव, तारानन्द वियोगी, जीवकांतजीक पोथी के दलिद्दर पोथी कहने छथि अहाँक मित्र जिनकर शीर्ष स्थान छनि अहाँक नजरिमे, कोन शीर्ष से देखू, , आर देखू श्वेतपत्रक दुनू सम्पादकपर आरोप, सरस , कीर्तिनारायण मिश्र के की कहने छथि, मानुस मैथिली कथा संग्रह थिक? देवशंकर नवीन परम चांगला छथि आजाद बाबूक नजरिमे आ श्रीनिवास हमपियाला, हमनिवाला, बेचारे श्रीनिवास जी कहियो दारू छूबो नै केलन्हि....गंगेश गुंजन पाराश्रयी संकीर्ण छथिराजमोहनी आलोचना- बाबू आजादे बतेता की होइ छै, नंगटपनीकेँ आजाद ससारि देताह मुदा रुकि जाइ छथि....


              19 hours ago · · 3 people

            • Shiv Kumar Jha
              BHA SAKAIT ACHHI JE GAARI PHADWA ME AJIT JEE SHIRSHA STHAN PAUNE HOTHI,PARANCH RACHNAKARAK ROOPEN SHIRSH SHTHAN DEV MAITHILI SAHITYAK ASHTAR KEN KHASHA DET,PATA NAHI SONU BHAI APNE KONA SAMIKHSA KARAIT CHHIYAIK,ONA AJIT JEE MAITHILI-MITHILAK PRACHAR MEN LAAGAL CHHAITH HAMHU SAAMAN DAIT,SHIRSH ASHTHANAK PARIBHASHA ASHPASHTA KAYAL JAY,JAUN JAUN KICHU POTHI KER RACHNAK AADAR PER APNE HINKA SHIRSHA MANAIT CHHYANI TA KONO BAAT NAHI,TAKHAN TA MAITHILI SAHITYAK OHEN SABH RACHNAKAR SHIRSH ME BAISHAL CHHATHI JINAK KICHU POTHI PRAKASHIT BHEL HUE


              9 hours

              hum pratirodhak rachnakar jarur chhi muda gair parhab hamar sanskar nai...aadar se baat karu...
              17 hours ago · · · See Friendship

            • ahan purvagrah se grasit chhi...chirouri karab, arari thanab, nirarthak pralap karab ektarhak kunth thik, manorogak lakshan seho thik. ehi se baanchu...lekhak ke positive hebak chahi...ahan negative kiyaik chhi...rachnatmak bahas karu anytha ehi bahas ke band karu...ahan lag kono nav gap nai achhi...yadi achhi ta se karu...
              5 hours ago ·  ·  · See friendship

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                • Ashish Anchinhar chirouri karab, arari thanab, nirarthak pralap karab ektarhak kunth thik, je ahan me achhi
                  5 hours ago ·  ·  1 person

                • Ashish Anchinhar rachnatmak bahasak yogya banoo, sojh jawab diye, sahitya akademik dalali me phayada chhai, assignment bhetai chhai, muda tai se maithili mari jayat takar chinta ai ahan ke
                  5 hours ago ·  ·  1 person

                • Ashish Anchinhar ramanand ray ramak yaih jhora ughbak aadati pair la lelkanhi, bujhle hoyat, kakro noro nai khaslai..apan aan ke pahichannai seekhoo, manorog se bahar hou
                  4 hours ago ·  ·  1 person

                • Ashish Anchinhar ahan ke sabh ta praman delahu, muda ahan nav nav gap uthelahu, takro praman delahu ta aab ahan bhagai chhi, ham ki ahan hari jayab aa maithili jeebi jayat se ne neek, sabh praman ke dubara dekhoo aa kahoo kon-kon manlahu aa kon kon nai.. aa se nai te manochikitsak lag jau
                  4 hours ago ·  ·  1 person

                • Ashish Anchinhar apana me confidence lau azad ji, dosra ke seedhi banabai me bad dikkat hoi chhai
                  4 hours ago ·  ·  1 person

                • Ashish Anchinhar satya bajnai, aa maithilik puraskar aa sahityik varnshankarta ke ujagar kenai negative chhiyai te mon rakhu je yaih ek din maithili ke jinda rakhtai, sabh ke kahi diyanhu je bahut bhel aab nai
                  4 hours ago ·  ·  1 person

                • Ashish Anchinhar
                  Sahitya Akademi me puraskar/ anuvad aa proof reading ke assignment jativad aa jholatanga vad par del jai chhai ki? sreedharam jee ke te maithili se eko pai dihari aai dhari nai bhetlanhi muda ahan te sal me kateko assignment pabai chhi, takar soochi deb aaki RTI me application day sahitya akademi se mangva liya je kon assignment katek gote ke bhetal chhanhi/ advisory board ke member apan aa apan kaniya/ patik naam se aa aan gote apan kaniya/ patik naam se katek lakh takak assignment paone chhathi...ahan te bad gote ke janai chhiyanhi sahitya akademi se, soochit karoo aa nai te RTI se te soochna bhetiye jayat...

                  12 minutes ago ·  ·  1 person

            • rajmohan jik sang hum nai chhorne chhiyain aa oho nai chhorns chhaith. sabta galat jankari achhi ahanke. avinash ji je kahaith muda ee baat satya je viyogi jik pasango hum-ahan nai chhi. hum ta avinash jik tulna me seho apna ke atyant chhot manait chhi...umra me nai..yogyta aa yogdan me...rahal baat jhora thebak baat ta se humar bhagya. pahine yatri jik, takhan kulanand ji, upendra doshi ji, pravasi ji, rajmohan ji, ramesh ji, pradip bihari ji, arvind thakur ji ,navin ji, bharadwaj ji, ramlochan ji sahit anek lekhakak jhora uthoune chhi. viyogi jik seho. ekar garv achhi hamra. ee bhagya ahan ke bha sakaiye tahi me hamra sandeh achhi.
              5 hours ago ·  ·  · See friendship

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                • Ashish Anchinhar kuntha se bahar aau aa apna par bharosa karoo, chamchagirik jamana gelai
                  5 hours ago ·  ·  1 person

                • Ashish Anchinhar apan baat par tikab sikhoo, 10 sal hunka sange rahaliyani aa 30-35 hazar me bakasi deliyani, aheen kahne chhi, ekhno facebook par achhi
                  5 hours ago ·  ·  1 person

                • Ashish Anchinhar jakre gari diyai takre jhora dhobi, neek gap bhel ki, aa pher gari aa pher jhora
                  5 hours ago ·  ·  1 person

                • Ashish Anchinhar lok ahank bare me jakhan kahaiye te kharap lagaiye, jinka lel ahan etek karai chhi se sabh ahank paroksh me bajai chhathi je ajit ke javat maachh khuebai taavte dhari, pher jahiya nai khuebai ukati det.. ahan oorjashali chhi, apan shakti ke pahichanu...ahank ee sabh dialogue ke lok sabh hasi urbaiye..ahank hriday pavitra achhi..muda lok se nai bujhaiye
                  4 hours ago ·  ·  1 person

                • Ashish Anchinhar viyojik pasango ham ahan nai kahi viyogi ke ahan mana lebanhi, se prayog ahan katek gote par karab, lok aab budhiyar bhay gel chhai, ee 21m shatabdi chhai, o yaih bujhtah je hamar chamchagiri kay rahal chhathi, kono kaaj hetanhi
                  4 hours ago ·  ·  1 person

                • Ashish Anchinhar avinash te ekhan ahan lag bachcha achhi,muda oho yaih bujhtah je azad ke kono kaaj hetai tain ee sabh baaji rahal hetai, ahank sojha me sabh ahanke thakai ye, takra bujhoo, sabh misuse karat, ramaji jekan aa pheki det...
                  4 hours ago ·  ·  1 person

                • Ashish Anchinhar yatri ji kakro jhora nai uthaba dai chhalkhinh, nahiye upendra doshiji, aa ramlochanji apan jhora apne uthabai chhathi, hinka sabh par ee aarop ahan samantwadi mansiktak tahat laga rahjal chhi
                  4 hours ago ·  ·  1 person

                • Ashish Anchinhar navinji ke pram changla (trikalagya bani) kahaliyanhi aa pher jhora utheliyanhi, te ki hunka mon me ahan prati aayal hetanhi
                  4 hours ago ·  ·  1 person

                • Ashish Anchinhar rameshji se te ahank toko bajji band bhay gel chhalah, ahank ahi aadatik hisabe ne
                  4 hours ago ·  ·  1 person

                • Ashish Anchinhar bhardvaj ji se akhno ahank relation neek achhi neek baat, ahan me oorja achhi, sadupayog karoo, kal jori binati achhi, hindi geeri jayat, maithili ke marba me apan yogdan nai karoo
                  4 hours ago ·  ·  1 person

                • Ashish Anchinhar jagdish mandal, durganand mandal bechan thakur, rajdeo mandal ji san uchcha kotik maithili sahityakar sabhak ppachha jayab te aarthik labh te nai bhetat muda sahityik drishtikon neek banat
                  11 minutes ago ·  ·  1 person

            Gajendra Thakur 
            इस बहस में कुछ चीजे सामने आई | बहस इधर -उधर गया पर मुख्य तत्त्व जो सामने आया वो यह की एक रचना दो भाषा में बिना कोमा/ विराम के अन्तर के मूल नहीं हो सकती, दूसरी बात ये की यदि हिन्दी संस्करण बाद में भी आया तो भी लेखक द्वारा उसे मैथिली का नहीं वरन हिन्दी का मूल कहना दुखद है| मै जब बच्चा था तो एक जापानी साहित्यकार भारत आये थे और उन्होंने हिन्दी सीख कर हिन्दी से कुछ रचनाये जापानी में अनूदित की| हिन्दी के साहित्यकारों ने उन्हें कुछ जापानी रचनाओं को हिन्दी में लिखने के लिए कहा तो उनका जवाब था की मैंने हिन्दी अपनी भाषा को समृद्ध करने के लिए सीखी है, यदि आप चाहे तो मै आपको जापानी सिखा सकता हूँ| मेरे एक मित्र ने दिल्ली में कहा की एक लौट बिहार से कथित साहित्य संस्कृति के क्षेत्र में आया था जो गाली गलौज कर आगे बढ़ने की कला में विश्वास रखता है| अन्ना हजारे और राज ठाकरे को गाली देने से काम नहीं चलेगा हमें सोचना होगा की बिहार के कर्मशील और प्रतिभावान लोग इसी लौट के चलते असुविधा जनक स्थिति में आजा है| खुशावंता सिंह ने एक जमाने में गुरचरण सिंह टोहरा को सिखों की स्थिति के लिए जिम्मेदार ठहराया था , ये लोग मैथिली में गाली गलौज कर हिन्दी में आते है और हिन्दी में एक्सपोज होने पर फिर मैथिली में आते है| सासामूसा के एक मुस्लिम बुजुर्ग बिजनेसमेन ने मुझे कहा था- दसा दस चला चालीस- माने लटके झटके १० दिनों के लिए होते है पर अच्छा चाल चलाना ४० बर्ष काम में आता है| हिन्दी से हम अच्छी रचनाओं का अनुवाद करे इससे मैथिली समृद्ध होगी, हम ऐसा कर रहे है, पर हिन्दी में अपनी रचनाओं का अनुवाद करने से ज्यादा अच्छा होगा हिन्दी भाषियों को मैथिली सीखने की प्रेरणा देना| इसी डिसकसन में एक सज्जन ने मैथिली के पाठको की संख्या पूछी और मिनिमम १० का फिगर से वे आगे बढे , उन्हें मैं ये बतला दू की मेरे उपन्यास सहस्राबाधानी का ब्रेल संस्करण विजुअली चैलेंज्ड पाठको द्वारा तीन डिजिट में पढ़ा जा चुका है, रेगुलर प्रिंट और ई बुक की तो बात छोड़े| "हमें " इस प्रश्न पर जीरो टोलेरेंस अपनाना चाहिए वरना हिन्दी की तरह हमारे पासा भी केवल साहित्यकार रहा जाएगे और खरीदार पाठक नहीं सरकारी लाइब्रेरी होंगी| ...


            Gajendra Thakur 

            लेखको द्वारा इस स्थिति को समझने की बजाय जिद पर अड़े रहना दुखद है| अनुवाद या पुनर्लेखन ही करना है तो अंग्रेजी / संस्कृत में करे जिससे तमिल / कन्नडा के लोग भी पढ़ा सके , हिन्दी में भी करें तो मूल मैथिली से अनूदित लिखे , अंग्रेजी संस्कृत में तो आपसे कोई पूछेगा भी नहीं और वे खुद हे "लिटरेचर इन ट्रांसलेशन " सीरीज में आपको डाल देंगे| जब तक जीरो टोलेरेंस नहीं अपनायेंगे तो हिन्दी वाली हालत हो जाएगी हमारी | सरकारी सहयोग और पैसा न अरबी भाषा को बचा पा रहा है न मारवाड़ी भाषा को |


            Mihir Kirti
            ABHI-ABHI EK NAYA-TAZA BAYAN AAYA HAIN SHRIMAN VIYOGI JI KA UNKE APNE HI WALL PAR ISI GHATNA KE UPR , USME UNHONE MOOL BAT KO YAH KAH KAR TALNE KI KOSHISH KI HAIN KI KUCH LOG MAITHILI MAIN GAALI DEKAR AAGE BADHANA CHAHTE HAIN, ISI SANDARBH MAIN VAH YE BAHI SWIKARTE HAIN KI VE BHI APNE BUJURGO KO GALI DEKAR HI AAG ITNE BADE HUYE HAIN. MAGAR JIS TARAH SRIDHARAM JAISE IMANDAR AUR SAHSI VAYKTI IS MANCH PAR AAR APNI BAAT KAHI USI TARH MAIN VIYOGI JI SE BHI UMMID KAR RAHA THA MAGAR VAH TO KUCH AUR HI NIKLE.PHIR BHI MAIN UNKI IS AATMSWIKAR SE MAIN SAHMAT HOON KI UNHONE BHI APNE BUJURGO KO GALI DEKR HI ITNE AAGE BADHE HAIN. MAGAR UNKI YAH CHORI-CHUPE BAYAN DENA ACHAA NAHI LAGA AUR ISI LIYE MAINE YANHA AAKR SABHI KO YAH SUCHNA DI HAIN.



            Taranand Viyogi लडाई की कुल जमा वजह यही दिखी कि लडके (और, उनके बुजुर्ग) मैथिली साहित्य में अपना स्थान चाहते हैं। यश और सम्मान। वाजिब बात है। यह उनको मिलना चाहिए। इसके लिए कई तरीके आजमाए जाते रहे हैं। एक पुराना तरीका है--सही-गलत मुद्दे खोज-खोजकर अपने सीनियर की कटु आलोचना करना और जहां तक बन पडे उन्हें गालियां देना। ये हर जगह होता है, हर पीढी में होता है।

            लेकिन, इसके साथ-साथ अच्छा लिखना भी पडता है। ये लडके इन्टरनेट की विस्तृति और व्यापकता का गहरा ज्ञान रखते हैं। हथियार के तौर पर इसके उपयोग की समझ भी उनमें है। पर, ये अच्छा लिख नहीं पा रहे हैं। गहराई इनमें नहीं है। न संवेदना के स्तर पर न ज्ञान के स्तर पर। इसका जतन भी वे नहीं कर पा रहे हैं। पर, हडबडी है।............देखकर दुख होता है।

            Taranand Viyogi
            मिथिला के कुछ लडके इनदिनों फेसबुक पर मैथिली लेखकों से लड रहे हैं। मुझे तो पता भी नहीं था, देवेश ने आग्रह किया तो लडाई देखने मैं भी उनके आंगन गया था। मजा नहीं आया। लडके इस तरह विवस्त्र होकर लड रहे थे कि शामिल होने का मन भी नहीं किया।

            लडाई की कुल जमा वजह यही दिखी कि लडके (और, उनके बुजुर्ग) मैथिली साहित्य में अपना स्थान चाहते हैं। यश और सम्मान। वाजिब बात है। यह उनको मिलना चाहिए। इसके लिए कई तरीके आजमाए जाते रहे हैं। एक पुराना तरीका है--सही-गलत मुद्दे खोज-खोजकर अपने सीनियर की कटु आलोचना करना और जहां तक बन पडे उन्हें गालियां देना। ये हर जगह होता है, हर पीढी में होता है।

            लेकिन, इसके साथ-साथ अच्छा लिखना भी पडता है। ये लडके इन्टरनेट की विस्तृति और व्यापकता का गहरा ज्ञान रखते हैं। हथियार के तौर पर इसके उपयोग की समझ भी उनमें है। पर, ये अच्छा लिख नहीं पा रहे हैं। गहराई इनमें नहीं है। न संवेदना के स्तर पर न ज्ञान के स्तर पर। इसका जतन भी वे नहीं कर पा रहे हैं। पर, हडबडी है।............देखकर दुख होता है।

            सीनियर के तौर पर गलियाने के लिए मुझे भी चुना गया है। खुशी हुई कि चलो, इस लायक समझा गया, 'नन-मैथिल' होने के बावजूद। मगर, दुख भी हुआ कि ये लडके ब्रह्म-वाक्य भाखने का दम्भ तो रखते हैं पर वास्तविक तथ्यों के बारे में कितना कम और अधूरा जानते हैं।देखिए, मुझे गाली देने के लिए ये 'जमीन्दार' शब्द चुनते हैं।

            मेरी पुरस्कृत किताब 'ई भेटल तं की भेटल' के बारे में बहुत अद्भुत जानकारी इसमें दी गई है। समझें, मेरा भी 'ज्ञान-वर्द्धन' हुआ, खुद अपने बारे में। लिखा है कि ये किताब मेरी हिन्दी किताब 'यह पाया तो क्या पाया' का मैथिली रूपान्तर है। अबे यार, पूछ तो लिया होता। 'यह पाया.....' १५० पृष्ठों का कहानी-संग्रह है जो २००५ में प्रेस गया पर प्रकाशक के महिमा-वश अब तक भी बाहर न आ सका। इसलिए लिखनेवाले ने इस किताब को कहीं देखा भी न होगा। पर, लिख दिया मजे से। और, इसी बिना पर मुझे गलियाये जा रहे हैं।

            अरे पंडित, कुछ तो स्तर निभाना सीख। कुछ तो गहरा हो यार। कुछ तो खयाल कर कि 'साहित्य' के क्षेत्र में काम करने आए हो, और वो भी विद्यापति की भाषा में। क्या होगा कल तुम्हारी 'मां मैथिली' का?



            Pradeep Chaudhary bilkul shaee kaha aap ne Taranand babu
            Thursday at 12:05pm · Like · 1 person

            Avinash Das Great View! Congrats!! Salaam!!!
            Thursday at 12:06pm · Unlike · 1 person

            Kumud Singh आरोप लगानेवालों की चुप्‍पी परेशान करनेवाली है, आखिर वो तेवर दिखानेवाले गायब कहां हो गए
            Friday at 10:50am · Like · 1 person

            Prakash Jha
            मुझे अत्यंत ही आश्चर्य हुआ इस जानकारी से कि ये कौन लोग हैं । तारानन्द वियोगी जी द्वारा लिखित पुस्तक ई भेटल त' की भेटल मैलोरंग प्रकाशन से प्रकाशित है । और मुझे अपने पुस्तक के बारे में अच्छी जानकारी है । इस तरह के विवादों को उठाने वाले लोग सचमुच मैथिली साहित्य से विलकुल ही अभिज्ञ हैं । किहीं भी अपनी अँगुली उठाने से पहले देख लेनी चाहिए की आपकी बाँकी चार अँगुली आपके अपने तरफ ही इशारा करती है । यह आरोप तारानन्द वियोगी पर ही नहीं मैलोरंग र्पकाशन पर भी है ।

            Friday at 10:56am · Unlike · 2 people

            Manoj Karn ai nab ukas pakasak darsnarth dhanyabad.-munnajee.
            Friday at 7:34pm via · Unlike · 1 person

            Vikash Jha taranand sire....main ek baat ye puchna chahta hun ki aapne apne aapko non-maithil kyun likha hai..ye baat mujhe pachi nahi...jara khulasa kijiyega...
            Friday at 7:41pm · Unlike · 1 person

            Shri Dharam ‎@Vikash ji maithilik tathakthit beta sab yatree je son la ka viyogi ji dhari jahi tarhen gariya rahal chathi tehna men keo ahi tarhen sochi sakait achi. jahi lekhak lokani ken gari del jarahal chani tinka jo maithili sn nikalidel jay t banchat kee ANNDA????
            Friday at 11:22pm · Unlike · 1 person

            Vikash Jha ‎Shri Dharam...tain ne kahlaun ..jakahn sir kahalkhin hum non maithil chi bada dukh lagal...kiyek t e sab jaun naie rahthin t kona kaaj chaltaie...e t uchit naie ne ki kakro saun 2 ta gaier sunla per ham apna aap ke oie community saun alag k li???
            11 hours ago · Unlike · 1 person

            Mihir Kirti ‎@ taranand--------------- vah main to kayal ho gaya aapki samvedna kaa jab hamre sahitykar vibhuti ji ko putrashok hua tha aur unnko akademi purskar mila tha to aapne samy -saal me main use santavna purskar kaha ----- us samay aapki samvedna ko kya lakva maar gaya thaa..........
            10 hours ago · Unlike · 1 person

            Mihir Kirti ‎@prakash---------- kaysthvad ke virodh me aapka jo bramhanvadi chehra saamne aane ke bad shayd is tarh ka comment aapki prakaskiya majboori ho sakati hain.
            10 hours ago · Unlike · 1 person

            Kumud Singh वाह, यह बहस बता रहा है कि मैथिली साहित्‍य का स्‍तर कितना उपर चला गया है, सभी से निवेदन है कि सभी गाली दे कर अपनी भडास निकाल लें, इससे आरोपी और आरोपित दोनों मैथिली के सेवक कहलाएंगे, शर्म किजिए यह सार्वजनिक मंच है
            10 hours ago · Unlike · 3 people

            Mihir Kirti ‎@kumud jI mafi chahi.
            4 hours ago · Unlike · 1 person

            Mihir Kirti ‎Vikash Jha---- neek masla uthebak lel dhnyvad. bhai jena kichu saal phine bhartak cricket team ke captain par match fixing ke aarop lagal rahaik aa pramanit seho bhelaik. takar baad o captain bayan delkai je ham alpsankhayk chii aa sampradayik tatav sabh hamra virudh me kahdyantra kelk achi. vartman ghatna ehne san achi.
            4 hours ago · Unlike · 2 people

            Sunil Kumar Mallick
            Viyogi G
            Pranam
            Bahut dinak bad aahank kalam sa likhal Sabda sab bhetal khusi lagal. Sange
            dukh seho je kichh nenpani dekhaba balak chalte aahan maithili pratik
            aahank apan yogdan ke kyo bisair nai sakaiye. Dosar aahan apna ke Maithil
            Nai kahai chhi ta apne ki chhi ? what's your identity? Tesar aahank Jawab
            hindi me aayael kiye apan bhasa maithilike Kakro sa kam bujhai chhiyai? Abhivyaktik Madhyam ke roop me maithili ke lag sabda Bhandarak kami chhaik
            ki? charim aa antim wakya je aahan likhne chhi je

            'साहित्य' के क्षेत्र में काम करने आए हो, और वो भी विद्यापति की भाषा में। क्या होगा कल तुम्हारी 'मां मैथिली' का? ki Maa maithili aahank Nai ? Viyogi san sidhasta writer aa maithili Pratik Dharna katau ne katau Bad taklif
            detai maithili me kaj kenihar lok sab ke.
            Besi Bajal hoi ta chhama kayal jetai.
            Sunil Mallick
            President
            Mithila Natyakala parishad, janakpurdham, Nepal

            3 hours ago via · Unlike · 5 people

            Bechan Thakur monak gap kahalau mallik ji..maithili par ehsan karaibalak kami nai chhai, kaj sutari gel aa maithili ke tata bye-bye kahai chhathi..hamahoo gair dvij chhi muda garv se kahai chhi je ham maithil chhi..muda tamase me te lokak asali vichardhara abaiye sonjha me..je karathu..
            3 hours ago · Unlike · 4 people

            Bechan Thakur
            poora bahas etai achhi sunil kumar llikji http://www.facebook.com/notes/ashish-anchinhar/%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BF%E0%A4%95-%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A3-%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%95%E0%A...See More

            3 hours ago · Unlike · 3 people

            Bechan Thakur blog par seho achhi http://www.ashantprashant.blogspot.com/ ee sampoorna bahas, otai javab delak baad ai maithilik group par hatasha vyakt karbak kono aavashyakta nai chhal..
            3 hours ago · Unlike · 3 people

            Sunil Kumar Mallick Bechan ji
            hatas sa besi ee taklif dai chhai khas ka ka Viyogi ji san Majal maithili abhiyani sa.
            Sunil Mallick
            3 hours ago via · Unlike · 4 people

            Bechan Thakur maajal lok sabh jan chhorthinh takhane asali groundwork lok sabh sojha ayatah aa maithili bachat..
            3 hours ago · Unlike · 4 people

            Sunil Kumar Mallick Etta chhorbak Baat kyo gote nai karu, sametbak baat karu. maithili ke aab bachaba ke jaruri nai chhai. bachayael ta ooi ke jai chhai je Rogiyah wa
            mair rahal hoi. hamra janait Maithili samridhik dis ja Rahal aaichh aab
            matra kukur kataunjh sa kanek bachbak jarurat chhai.
            3 hours ago via · Unlike · 6 people

            Bechan Thakur sahi kahalau, muda gulchharra urabaibala sabh se bachebako jaroori parite chhai, ek gaal me thapar kha ka dosar gaal sojha dai bala jamana gelai..
            3 hours ago · Unlike · 4 people

            Rajdeo Mandal samay aabi gel achhi je maithili aa hindi dunu me ekke rachna ke maulik kahay bala par aa false biodata denihar par lagam kasal jay, sametabak baat karait karai katek black-sheep maithili me ghusi gel achhi je hindi bala sabh maithili ke barbad karaile ghusene achhi..

            Gautam Rajrishi पूरे प्रकरण को जिस तरह से सामने लाया है वो प्रशंसनीय है आशीष भाई... यदि सचमुच एक रचनाकार अपनी ही किसी रचना को अन्य भाषा में अनूदित कर उसे मौलिक रूप में प्रस्तुत करता है तो निसन्देह अशोभनीय है....लेकिन आपने वियोगी जी का संदर्भ भी दिया है और इस मुद्दे पे उनके दिये गए जवाब विशेष कर "यह पाया तो क्या पाया" के संदर्भ में का प्रति-जवाब तो बनता है आपकी तरफ से|
            about an hour ago · Like · 1 person
            Ashish Anchinhar ‎"ye paya to kya paya" 6 saal se chhapa nahi to kis prakashak ke paas hai, jab apane paise se hi chhapwana hai to prakashak ki kya chinta hai bhai saheb, puraskar milne ke ek saal ke baad aur ab takis dauran chhape unke kisi bhi kitab me prakashya kah kar uska ullekh nahin, "ee=ye, bhetal=paya, ta=to, ki=kya, bhetal=paya;sath hi unke book karmdharay ka flap me "यह पाया तो क्या पाया" 2005 me prakashit soochi me hai, ab 2011 me vo aprakashit kaise ho gaya, flap ka scan is blog par hai, oopar ke kuchh link broken hai, vo sabhi scan bhi is link par hai http://ashantprashant.blogspot.com/
            7 minutes ago · Like · 1 person

            Rajdeo Mandal Gautam Rajrishi ji , badha chadha ke biodata likhnai huay ya hindi me likh kay maithili anuvad karay ke ; va dunu sange, aei sab baat me maithili par ehsan karaibala kichhu lekhak aaga chhathi,..naitikta se hinka sabh ke kono sambandh nai..11 hours ago · · 1 person

            • ब्राहमणवाद मैथिली मे इतना रहा कि शुद्धतावादियों ने इसे अपने पास सुरक्षित कर लिया और अन्य सभी को 'सोलकन' बना दिया. अब जब लोग मैथिली छोडने लगे तो ये 'सोलकन' को बुलाने लगे, जैसे उपकार के साथ.
              Friday at 9:01pm · · 


              भाषाविज्ञान छोडि दियऊ. खाली एतबे कहू, जे मैथिली आ भोजपुरी में कोन व्यावहारिक अंतर छै?
              Friday at 9:12pm · ·


            • Vibha Rani शाहिद भाई, केवल पसंद करके मत छोडिए, कुछ बोलिए भी.
              Friday at 9:22pm ·

            • Ram Bahadur Rennu maithli --mith boli...........!!!.....parantu....bhojpuri............///???
              23 hours ago ·

              अवसरवादीअभ के छोडि दी त' कहल जाओ जे कतेक लोक छथि पृथक मिथिला राज्यक समर्थन में?
              ‎2004 मे मैथिली भारतीय संविधानक अष्टम सूची मे सम्मिलित भेल. तकरा बाद मैथिलीक कतेक विकास भेल आ ई सहज प्रश्न छै. काल्हि हम अही पर चर्च करैत छलहुं. मैथिलीक अत्यंत वरिष्ठ रचनाकार क्षुब्ध स्वर मे कहलन्हि, जे अधलाह से अधोगति मे पहुंचि गेल अछि.अष्टम सूची मे सम्मिलित हेबा स' पहिने सभ कहि रहल छलाह जे जाबति मैथिली अष्टम सूची मे सम्मिलित मे नयि आओत, ताधरि एकर विकास असम्भव.
              Friday at 9:46am · ·
              मैथिल भ' क' अहां मिथिला से बाहर चलि गेलहुं, मैथिल भ' क' यदि मैथिली से इतर भाषा मे काज कर' लगलहुं, त' ई अहांक अक्षम्य अपराध अछि. मिथिला से बाहर रहि के आ मैथिली से अलग हिंदी मे काज क' के हम मिथिलाक प्रति वफादार नयि भ' सकैत छी. एहेने सनक मंतव्य भेटल हमरा.
              Friday at 9:41am · ·
               Prakash Jha
              मैथिली-भोजपुरी अकादेमी, दिल्ली या कि .......... बन्धु अकादेमी ? दिल्ली सरकारक एकटा जिम्मेदार ऑफीसरकेँ की एहि तरहक स्थिति उत्पन्न करबाक चाही ? एहि अकादेमी स’ जुड़ल सदस्यक सूची पर एक नज़र :

              उपाध्यक्ष : गिरीश चन्द्र श्रीवास्तव
              सचिव : रवीन्द्रनाथ श्रीवास्तव
              सदस्य : शेफालिका वर्मा
              रवीन्द्रलाल दास

              दिनांक: 12 मार्च, 2011 क’
              आमंत्रित वक्ता : नूतन दास
              संजू दास
              इन्दु दास
              विनीता मल्लिक
              अरुणा चौधरी
              कामिनी कामायनी

              (मार्च क्लोजिंग के अवसर पर मैथिलीक ई विद्वान लोकनि साहित्य काहें लिखल जाव ? विषय पर संगोष्ठी मे अपन अपन गंभीर विचार विमर्शक लेल आमंत्रित छलीह / छलाह । ई संगोष्ठी मैथिली साहित्य के की दिशा देने होयत से एहि संगोष्ठीक विषय आ विचार विमर्श मे भाग लेनिहारि / लेनिहार विद्वानक विद्वता स’ सहजहिं अनुमान लगाओल जा सकैत अछि । मैथिलीक यैह विद्वानक सोचक आधार पर मैथिलीक भविष्य टिकल अछि । मैथिली भाषाक प्रति अपन कर्तव्य आ अपन व्यक्तिगत ज्ञानक आभास त’ लोकमे हेबाके चाहियनि । उपर्युक्त विद्वानक चुनाव छनि गंगेश गुंजन, शेफालिका वर्मा, रवीन्द्रलाल दास आदिक । यैह लोकनि एहि अकादेमीक सदस्य छथि ।
              about a month ago · · · Subscribe

             

            Umesh Mandal
            ऐमे विभा रानी जीक सामंती दृष्टिकोणपर हमर बाजब आवश्यक: कारण हुनका जे हम फ्रेंड रिक्वेस्ट पठेलियन्हि से अखन धरि ओ स्वीकार नै केलन्हि अछि, से हुनकर वालपर हम कमेंट नै द' सकलौँ। पहिल हुनकर ई कहब जे शोलकनकेँ आब मैथिली साहित्यमे बजाओल जा रहल छै, जेना उपकार कएल जा रहल हो: विभाजी अहाँ 1984 सँ मैथिली साहित्यमे छी कएकटा शोल्हकन केँ उपकृत केलियै? दोसर ई हुनकर सामंती सोचक परिचायक अछि, जे शोल्हकन साहित्यमे आएल से मूल साहित्यकार नै वरन ओकरा बजाओल गेल छै!! ओकरापर उपकार कएल गेल छै?? आ से उपकार जे कियो केनहियो छथिन्ह(विभाजीक शब्दमे) तँ से उपकार करैबला वा उपकृत व्यक्ति ई कहि रहल छथि? ..तकर प्रमाण विभाजी देथु... विभाजी आ आन टैलेंटेड साहित्यकार आ जगदीश प्र. मण्डल, बेचन ठाकुर, दुर्गानन्द मण्डल, राजदेव मण्डल केँ उपकार क' बजाओल गेल छन्हि?? एकटा आर बात... विभाजी अहाँ लिली रे, प्रभास, हरिमोहनक अनुवाद हिन्दीमे केलहुँ, राजकमल कथाक अनुवाद हिन्दीमे सारिकामे छपबेलहुँ तकर के विरोध केलक, अहाँ स्वयँ विरोध क' रहल छी... अहाँक मूल हिन्दीक के विरोध केलक.. क्यो नै..अहाँक मैथिलीक मूल रचनाक हिन्दीमे मौलिक कहि वा हिन्दी मूल रचनाकेँ मैथिलीमे मूल कहि विरोध पहिने नै भेल अछि की... मानेश्वर मनुज घर बाहरमे ऐ आशयक चिट्ठी पहिनहिये पठेने छथि...अहाँक बच्चा लिखै तँ ओ भेल टैलेंटेड आ शोल्हकनक बच्चा लिखए तँ ओ भेल जे ओकरा बजा क' लिखबा क' उपकृत कएल गेलै???

            17 minutes ago · · 1 person
            Umesh Mandal मानेश्वर मनुजक चिट्ठीक लिंक: http://www.facebook.com/vibhar1?ref=ts#!/photo.php?fbid=159525844106971&set=a.155535957839293.32569.100001486694441&type=1&theater2 minutes ago · · 1 person

            Ashish Anchinhar
            भाइ श्रीधरम के लिये-----

            मैथिली कथा ब्रम्हन्याय का हिन्दी सारांश-----ः
            शहर का एक सभ्रान्त मुहल्ले मे अचानक ही एक अछूत आफिसर के आ जाने से सभी स्वर्ण बौखला गये हैं। और उनकी बौखलाहट मे तेजी उस सुबह हुई जब वह अछूत आफिसर उन स्वर्णो को भोज पर आमंत्रित किया। राजपूत प्रतिनिधि उस आफिसर की ऐसी-तैसी कर देने की सलाह देते है।ब्राह्मण और अन्य भी अलग किस्म से इसे तिरस्कार करने की मंशा जहिर करते हैं। मगर जैसे-जैसे शाम होती है सभी स्वर्णो का चेहरा सामने आने लगता है और वे अकेले-अकेले वहाँ जाकर अपना चेहरा दिखाने की सोचते है। और जब वही स्वर्ण गालिब के अंदाज मे एक दूसरे से मिलने लगे तो आपस मे कइ तरह के बहाने बनाने लगे और उस आफिसर के पास पहुँच कर एक दूसरे की बुराइ करने लगे।

            हिन्दी कहानी नव जात(क) कथा का सारांश-----ः

            गाँव भर मे आज के घटना से तूफान मच गया। गणेश झा की बेटी फूकन मोची के बेटे के साथ भाग गयी है। छोटे जात के लड़के मूँछ पर ताव देकर इस काम को सही ठहराते है। जबकि स्वर्णो के यहाँ मुर्दनी छायी हुइ है। राजपूत इस घटना के लिये ब्राम्हणो की कयरता को ठहराते है। गणेश ने अपहरण का मामला दर्ज कर दिया है। और इस चक्कर मे उसकी सारी जमीन चली गयी । आखिरकार दोरोगा जी के दो महिने के अथक मेहनत से लड़की मिल जाती है। लड़की ने उस अछूत के साथ ही रहने कि जिद ठान ली है। अंततः ५०००० हजार रुपये देकर जाली प्रमाणपत्र बनबाकर कर लड़की को नाबालिग सिद्ध कर दिया जाता है।और उसकी शादी तय कर दी जाती है। तभी पता चलता है कि, लड़की गर्भवती है, फिर एक डाक्टर को बुला कर गर्भपात करने के लिये लड़की को घर मे बन्द कर दिया जाता है।

            दोनों कथा (कहानी) मे असमानता-----------ः
            कथा ब्रम्हन्याय मे एक अछूत आफिसर मुहल्ले मे आता है, जबकि कहानी नवजात(क) कथा मे एक स्वर्ण लड़की अछूत के साथ भाग जाती है।

            दोनों कथा-कहानी मे समानता-----------ः

            १) दोनो कथा-कहानी कि शुरूआत एक जैसी मतलब एक तूफानी घटना से शुरू होती है।
            २) दोनो कथा-कहानी का प्लाट स्वर्ण-शूद्र है।
            ३) दोनों कथा-कहानी मे स्वर्ण पात्र पहले एक मत हो कर आखिरकार बिखर जाते है।
            ४) दोनो कथा-कहानी का निष्पति एक ही जैसा है ( कथोपकथन के कारण कुछ अलग दिखता है)




            कथा समीक्षा को अगर गौर से देखें तो स्पष्ट मान्यता है कि मात्र स्थान-काल- पात्र मे अंतर कर देने से कोइ भी दो रचना को अलग-अलग नहीं माना जाना चाहिये ( मेरे हिसाब से यह मान्यता उन रचनाओं पर अधिक है जिसके रचनाकर एक ही हैं )| और उपर के दोनों कथा-कहानियों मे जो भी अंतर आया है वह मात्र स्थान-काल-पात्र एंव कथोपकतन के कारण आया है। इस तरह माना जाना चहाहिये कि, दोनो कथा-कहानी एक ही है या एक दूसरे का पुनर्लेखन है जिसकी तरफ खुद लेखक ने इस बहस मे इशारा किया है ।.......

            .
            about an hour ago · Like
            Ashish Anchinhar
            ाइ मिहिर जी धन्यवाद इस cpoy-pest केलिये| इस अभद्र भाषा में लिखे गए आलेख का जवाब देना मुझे अच्छा तो नहीं लग रहा है परंतु इन महानुभाव की मानसिक अवस्था को देखते हुए दे रहा हूँ।
            देवेश ने क्या आग्रह किया इसका वर्णन आवश्यक नहीं, साहित्य अकादेमी के अधिकारी ने इन्हें फोन पर यदि कुछ कहा तो उसको सार्वजनिक करना आवश्यक नहीं, वैसे भी इनके या अन्य लेखकों के कृत्य के लिए वे जिम्मेदार नहीं हैं।
            विवस्त्र होकर कुछ विखण्डित लेखकों से ही क्यों लड रहे थे, सोचें।

            आदमी गुस्से में अपनी असली आइडियोलोजी पर आ जाता है, उसे वही दिखता है जो वह अपने बचाव मेँ सोचता है, जो वह सोचता है, आपने सोचा “लडके (और, उनके बुजुर्ग) मैथिली साहित्य में अपना स्थान चाहते हैं। यश और सम्मान।“ यह वे नहीँ आप चाहते होँगे जब आप लडके होँगे या फिर बुजुर्ग हुए होंगे..इस सम्बन्ध मेँ आपके अपने प्रति अपनी सोच को सलाम- आपका ये चरित्र आपके साहित्य में पहले भी उजागर हो चुका है, जिसका उल्लेख मैँ पाँच साल पहले अंतिका में कर चुका हूँ (स्कैन कॉपी) लगी है।http://www.facebook.com/home.php#!/photo.php?fbid=207698909255431&set=a.205267119498610.57287.100000459693390&type=1&theater इसी क्रम मे एक बात और भी है कि, श्रीधरम मुझे तब भी बेहतर लगे थे, और अभी के घटना क्रम को देखें तो वे आज भी बेहतर हैं। ......
            59 minutes ago · Like
            Ashish Anchinhar
            सही-गलत मुद्दे खोज-खोजकर अपने सीनियर की कटु आलोचना करना और जहां तक बन पडे उन्हें गालियां देना” ये आप करते रहे हैँ पर आपका ये कहना कि “ये हर जगह होता है, हर पीढी में होता है” आपकी व्यक्तिगत सोच है- ब्रह्म-वाक्य है, आपके व्यक्तित्व का हिस्सा है।
            आपका ये कहना कि “लेकिन, इसके साथ-साथ अच्छा लिखना भी पडता है“ आपका अपने बारे मेँ व्यक्तिगत कथन है। अब आपकी लेखनी पर चर्चा हो जाए, आप गजल लिखते हैँ और आपको बहर का ज्ञान नहीं, छन्द का ज्ञान नहीं; हिन्दी में (आपके शिष्य ने आपको हिन्दी-मैथिली में आवाजाही करने वाला कहा है) इस गजल को पुनर्लेखित कर देखें, गजल में भगवानपर भी व्यंग्य किया जाता है पर, पर छन्द के मामले में वो लिबरल नहीं , कट्टर है; हिन्दी –उर्दू में आपकी गजल के लिए डस्टबिन भी नहीं मिलेगा; क्यों गजल की खाल खीँच रहे हैं। अब आपकी समीक्षा पर आएँ- आप बिना पढे लिखते हैं – राजमोहन जी ने सगर राति में आपके सोते रहने को लक्ष्य कर कहा था- और मैं उदाहरण क्योट कर रहा हूँ; आपके समीक्षा पर एक सम्पादकीय मेँ आया- “नमाजे-शुकराना:- धूमकेतु- राम कहने पर नमाज के वक्त तोते को मार डालना और बच्चे का रोना- आपने हेडिंग पढा और समीक्षा कर दिया ये “साम्प्रदायिक सौहार्द्र की कथा है। अब आपके शोध पर आएँ- हिन्दी की आवाजाही वाली पुस्तक गोनू झा- आपका शोध- गोनू झा 300 साल पहले हुए- जनाबेआली- विद्यापति 1350 मे हुए, और उससे 10 पीढी ऊपर गोनू झा हुए; लिखित तालपत्र आधारित वर्णन उपलब्ध है, और रामदेव झा ने 20 साल पहले लिखा हुआ है, पर ...”आपकी संवेदना इस अभद्र नोट से जाहिर है और ज्ञान का उल्लेख तो मैँने कर ही दिया है। साहित्य अकादेमी पुरस्कार के लिए आपकी हडबडी जगजाहिर है...इंटरनेट लिटेरेट आप भी हैं, पैसे के अलावा ये चीजें भी जरूरी हैं, पर इसका दुरुपयोग ऐसे अभद्रतापूर्ण लेख लिखने मेँ नहीं करें।

            “पुरस्कार” मिलने तक आप मैथिल थे पर मैथिली का यूज यहीँ तक सीमित था, अब आप नन-मैथिल हो गए.. शोधपूर्ण विखण्डात्मक कथन...

            आपके अजित आजाद द्वारा उठाये प्रश्न के सम्बन्ध मेँ मेरी आपत्ति की चर्चा की है, जमीन्दार! जनाबेआली, आगे क्योँ छोड दिया, मैंने नीम का पेड पढने के लिए उन्हें कहा था (सीरियल तो देखा होगा), नहीं तो जगदीश प्रसाद मण्डल जी का “बोनिहारिन” पढ लें , आपको बोनिहार और जमीन्दार का अंतर पता चल जाएगा.. और यदि जमीन्दारी एक्ट की बात करेँ तो आप क्या दरभँगा राज को छोड कोइ भी जमीन्दार नहीँ मिलेगा आपको.. ....
            57 minutes ago · Like
            Ashish Anchinhar
            ई भेटल तं की भेटल' के बारे में आपको अद्भुत जानकारी मिली, हमें भी मिली आपके द्वारा; आपने कर्मधारय में उसे प्रकाशित सूची में डाला, प्रेसमेँ अब आप बोल रहे हैँ; उसका प्रमाण स्कैन कर मँने डाला हुआ है, विवस्त्रता से अपनी घृणा मेँ शायद आपने वो नहीँ देखा होगा.. अब तो 'ई भेटल तं की भेटल' पर पुरस्कार की घोषणा को साल होने को आया; एक साल से ये चर्चा चल रही है, मैंने तो बस ये मुद्दा उठाया है.. पर क्या इसकी जानकारी आपको नहीं थी.. मिथिला सृजन में मौलिकता सम्बन्धी प्रश्न जब आपसे पूछ तो आपने बात घुमा दिया—उपनिषद कथ है पर मैंने पुनर्लेखन.. जनाबे आली- हिन्दी की पुस्तक को मैथिली में क्यों किया इसका प्रश्न है ये.. प्रश्नकर्ता शायद कनफ्यूज हो गए पर मैं थोडे ही हूँगा... आप अपनी आइडियोलोजी या कहे पर टिकते क्यों नहीं? मैंने ये अंतिका में पाँच साल पहले आपसे पूछा था, आपने 2005 में हिन्दी पोथी प्रकाशित की..ये आपने कहा, अब पुरस्कार प्राप्त करने के एक साल बाद आप कह रहे हैं , वो प्रकाशक के पास 5 साल से पडी हुई है, ये व्यक्तित्व में द्वन्द क्यों, कौन भरोसा करेगा आपकी बातों का, और आप प्रकाश को भी ले आए, 'ई भेटल तं की भेटल' मैंने प्रकाशित की.. मुझे सब पता है.. जनाब 2005 की पुस्तक क्या आपने प्रकाशित की थी, , 'ई भेटल तं की भेटल' आपने प्रकाशित की थी, ये तो सबको पता है। चलो इस बहाने 2005 को भी प्रकाशित करने का ठेका आपको मिलेगा। गलियाते हम नहीं, अपनी अपाधि मुझे क्यों दे रहे हैं। अपनी बात पर टिकना सीखें (फ्लैप स्कैन देखें); कभी यात्री , कभी विद्यापति.. ये सत्य के साथ होते हैं , असत्य के साथ नही। और आपके स्तर पर हम नहीं आएँगे , मैथिली उस स्तर पर रसातल में चली जाएगी। .........
            57 minutes ago · Like




















            Buddhi nath Mishra,  १८ अप्रैल २०११ ४:५७ अपराह्न  


























            प्रिय आशीष जी,
            मैथिलीक एकटा बड़का समस्या पर अहाँ अंगूरी उठेलहूँ| हमहू अहि वर्णसंकरता के अनैतिक बुझैत छी| एही सूची में किछु आर साहित्यकार आबि सकैत छथि| हम स्वयं ई काज कहियो नहीं क' सकलहूँ| पलखतिये नहीं छल| नोकरी आ हिन्दीक कवि सम्मेलन पर्याप्त समय आ उर्जा ल लेत छल| तैं जे समय भेटल तकर उपयोग मूल रूप सं बेसी काल हिन्दी आ किछु काल मैथिली में नवगीत ,निबंध आ कथा लिखबा पर लगेलौं,ई बिचारि कें जे अनुवाद तं बादो में होइत रहतै | हमरा आग्रह पर जखन कमलेश्वर जी जखन `सारिका' क तीन अंक मैथिली कथा विशेषांक निकालालनी,तखन आन कथाकारक कथा संग अपनो कथा `मिझायल टेमीक गंध' क अनुवाद `बुझी हुई बाती की गंध ' क नाम सं केने रही|बस, एतबे धरि| शेष अनुवाद बाद में अहाँ सभ क लेल छोडि देलहुं अछि|
            बुद्धिनाथ

      • Subhash Chandra आपके ये कथन सुनकर स्मरण हो आया उस व्यक्ति का जिन्हें मैथिलि के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला और वो सार्वजानिक मंच से बोले की में तो लिखता पढता हूँ हिंदी में और देखिये मैथिलि वालों ने मुझे पुरस्कार दे दिया....मेरे हिसाब से किसी भी भाषा के लिए ऐसे लोग स्वीकार्य नहीं होने चाहिए...
        Ashish Anchinhar ‎Subhash Chandra----bhai us lekhak ka naam savrjanik ki jaaye.
        Subhash Chandra ‎@ maithili mein wikiliks jaisa kam karna chahte hain aur itni jankari nahi rakhte.... delhi ki maithil patrakaron se puchh lijye.... 5 varsh pahle ki ghatna hai .... kamani auditorium ki...
        2 hours ago · · 1 personYou like this.
        Ashish Anchinhar bahi tlashna kya . naam hain gangesh gunjan. magar main ppake himmt ko dekh raha tha . aapme vo himmat hain hiu nahi

        Ashish Anchinhar धन्यवाद बुद्धिनाथ मिश्रजी...।
        22 hours ago · UnlikeLike · 2 peopleLoading....Ashish Anchinhar साकेतानन्द जीक संदेश: एक टा साहित्यिक रंगदार बिहरि स'बहरेला अछि अजित कुमार आज़ाद जी। लिखतथि-पढितथि त'से जथ-कथ,भरि
        पटना घुमि-घुमि क'एकर बात ओकरा त'कोनो गुलछर्रा अनेरे उडबैत रहता,लोक के लडबैत,तरह-तरह के लांछन लगबैत समय गमेता।एखन फेस बुक पर ओ लि...खै छथि जे हम आ भाई साहेब ( राजमोहन जी) मैथिली कथा के हिंदी अनुवाद क' हिंदियो के लेखक सब मे अपन नाम करै लए चाहै छी। हम्रर मैथिली कथाक सब हिंदी अनुवाद मे"मैथिली कथा" शीर्षकेक संग छपल रहै छैक,से हुनका नंइ सुझै छनि । आंखि मे गेजड जं भ'जाय,त'कोना सुझत ? हमर एहन कथा "काल रात्रिश्च दारुणा" जुलाइ 2009 के वागर्थ पत्रिका मे छपल अछि, से देखौत,किंबा हमर कोनो हिंदीक रचना देखा दौथ जाहि मे ई नंइ लिखल हुए जइमे मैथिलीक कथाक उल्लेख नंहि हुए त'मानि जेबनि ।बिना आधारक एहेनसब बात लिखब साहित्यिक रंगदारी नंइ त' आर की कहौतै? ...8 minutes ago · LikeUnlike.Ashish Anchinhar धन्यवाद साकेतानन्दजी..

        साहित्यिक वर्ण-संकरता-: तथ्य---मैथिली साहित्य का विकिलीक्स

        by Ashish Anchinhar on Tuesday, April 5, 2011 at 1:35pm
        स्पष्ट है कि भामती/ हसीना मँजिल/ यह पाया तो क्या पाया हिन्दी पुस्तक के रूप मेँ  प्रकाशित करने का दावा किया गया है। फिर भी यदि फ्लैप बदल कर अपनी गलती को उषा किरण जी या अन्य साहित्यकार अपनी गलती का सुधार करते है तो इससे ज्यादा खुशी की क्या बात है, जिस लेखक ने श्रीधरम पर आरोप लगाया है (पंकज पराशर) वो तो दूसरे की रचनाओं को अपने नाम से छपवाता है, इसलिए किसी लेखक द्वारा अपनी रचना का अनुवाद या पुनर्लेखन करने पर उँगली उठाने का उसको नैतिक अधिकार नहीं है। मैँ तो श्रीधरम जी का (और विभाजी का भी)कायल हो गया हूँ, उनमेँ ये हिम्मत है कि स्वयँ आगे आए हँ, दूसरे लेखकोँ की तरह नहीँ जिन्होँने अपने पालतू शिष्योँ के माध्यम से इस बहसमेँ हिस्सा लिया। एक बात और, लेखक हार्ड बाउंड में फ्लैप चेंज कर अपनी गलती सुधार सकते हैं, पेपरबैकमे पतला फ्लैप चढाकर भी गलती सुधारी जा सकती है। जय मिथिला. जय मैथिली




        भाइ अजित आजाद के लिए: हिन्दी उपन्यास: रमेश खत्री:हिन्दी साहित्य: एक साहित्यिक आकलन वर्ष 2010’ उपन्यास
        उपन्यास ऐसी गद्य विधा है जिसमें जीवन के उतार चढ़ाव देखने को मिलते हैं । और जीवन की समग्रता को नजदीक से देखने का प्रयास किया जाता है । कश्मीर की पृष्ठभूमि पर मनीषा कुलश्रेष्ठ का ‘शिगाफ’ तमिलनाडू की पृष्ठभूमि पर तेजिंदर का ‘सीढ़ियों पर चीता’ महानगर मंमबई की चमक दमक की परते उधेड़ता रवीन्द्र कालिया का ‘17 रानाडे रोड़ आया । ‘पानी बीच मीन पियासी’ मिथिलेश्वर का, ‘दासी की दास्तान’ में विजयदान देथा राजस्थान की लोककथा को आधार बनाते हैं । सुरेन्द्र वर्मा ‘काटना शमी का वृक्ष पद्मपंखुरी की धार से’ आया जिसमें सांस्कृतिक विघटन की कथा निहित है । रवीन्द्र वर्मा का ‘क्रांति कक्का की जन्म शताब्दी’ मध्यमवर्गीय मुस्लीम परविार की कर्ह पीढ़ीयों की जीवन गाथा प्रस्तुत करता है । विनोद कुमार श्रीवास्तव का ‘वजह बेगानगी नहीं मालूम’ आया । इसने हमारे सम्मुख उस समय की परतों को खोला जब हम सांप्रदायिक सोहाद्र्र सें विलगित हुए । विद्यासागर नौटियाल ‘स्वर्ग दद्दा! पाणी पाणी ’ मिलिन्द बोकिल का ‘समन्दर’, विजय शर्मा का ‘दिमाग में घोंसले’, विष्णु चन्द्र शर्मा का ‘रेखाएं दुख की’, पंकज सुबीर का ‘ये वो सहर तो नहीं’, कुणाल सिंह का ‘आदिग्राम उपाख्यान’, सुषम बेदी का ‘मैंने नाता तोड़ा’ विकास झा का ‘मैंकलुस्कीगंज’, राजनारायण बोहरे का ‘मुखबीर’ प्रमुख हैं । इसी तरह उपन्यास लेखन में महिला लेखिकों ने भी इस वर्ष अपनी अच्छी खासी उपस्थिति दर्ज की है जिनमें प्रमुख हैं संतोष श्रीवास्तव का ‘टेम्स की सरगम’, सिमी हर्षिता का ‘जलतरंग’, सुधा अरोड़ा का ‘यहीं कहीं घर था’, शुभा वर्मा का ‘कृतिका’, नीरजा माधव का ‘ईहामृग’, मीराकान्त का ‘एक कोई था कहीं नहीं सा’, उषा किरण खान का ‘भामती’ कमल कुमार के दो उपन्यास आये ‘पासवर्ड’, ‘मैं घुमर नाचूं’ आदि प्रमुख हैं । इन उपन्यासों की विषयवस्तु बिल्कुल अलग और प्रयोगों को साधते हुए हमारे सम्मुख खुलती है ।
        हसीना मंजिल: अजित आजाद के लिए: ललित सुरजन का लेख: मुझे जब भी अवसर मिलता है मेरी कोशिश होती है कि ऐसे रचनाकारों को पढ़ा जाए जो साहित्यिक चर्चाओं के केन्द्र में नहीं हैं। मैं यहां सिर्फ उनकी बात कर रहा हूं जिनकी लेखनी में सचमुच कुछ शक्ति हैऽ लेकिन जो इस रूप में अशक्त हैं कि अपनी चर्चा स्वयं कराने का गुण उन्हें नहीं आता। एक नाम मैं 'विस्फोट' कहानी संग्रह के लेखक रामनिहोर विमल का ले सकता हूं। उनकी कहानियां दलित समाज की दु:सह्य पीड़ा को अपेक्षित कलात्मकता के साथ बयान करती है। मैं दूसरा नाम झारखंड के कहानीकार कालेश्वर का ले सकता हूं जिनकी कहानियों में भूमंडलीकरण के प्रभाव से तहस-नहस हो रही सामाजिक संरचना का प्रमाणिक दस्तावेज मिलता है। कुछ समय पहले मुझे उषा किरण खान का उपन्यास 'हसीना मंजिल' पढ़ने का अवसर मिला। पांच वर्ष पूर्व प्रकाशित इस उपन्यास पर अब तक चर्चा क्यों नहीं हुई कि इसलिए कि उषा किरण खान का नाम अनजाना नहीं है। वे संभवत: पिछले चार दशक से लेखन कर रही हैं तथा एक समय हिन्दी की सभी प्रमुख पत्रिकाओं में हमने उनकी रचनाएं प्रकाशित होती देखी हैं।
        मुझे 'हसीना मंजिल' पर थोड़े विस्तार के साथ बात करना इसलिए जरूरी लग रहा है कि इसमें लेखिका ने एकदम से एक नया विषय उठाया है। हृदयेश के उपन्यास 'किस्सा हवेली का' से इसकी एक संदर्भ में तुलना की जा सकती है। हृदयेश ने उपन्यास में अपने परिवेश का अतिक्रमण करते हुए एक नितांत नए परिवेश में झांकते हुए उसे समझने की कोशिश की है। वे संभवत: एक मात्र गैर दलित लेखक हैं जो दलितों की बस्ती में जाने का साहस जुटा सके। इसी तरह उषाकिरण खान ने बिहार के मुस्लिम समुदाय के भी एक छोटे से वर्ग चूड़ीहार समाज के जीवन के विविध आयामों का चित्रण गहरी संवेदना के साथ इस उपन्यास में किया है। नायिका सकीना एक छोटे से गांव में रहकर लाख की चूड़ियां बनाती और बेचती है। कथा का ताना-बाना उसके इर्द-गिर्द ही बुना गया है, लेकिन यह विस्तार लेकर एक पूरे समाज की कथा बन जाती है। इसमें देश के बंटवारे की पीड़ा है, बदलते दौर में मशीनों के आ जाने से हस्तशिल्प के बर्बाद हो जाने की व्यथा है, गांव-जवार में सामाजिक संबंधों के जुड़ने-निभने की दास्तान है, और है नारी मन की उमड़ती-घुमड़ती वेदना। मुझे इस लघु उपन्यास ने पहिले तो विषय के अनूठेपन के कारण आकर्षित किया और फिर विषय के प्रति लेखिका के सहानुभूतिपूर्ण उपचार के कारण प्रभावित। इसे पढ़ते हुए बार-बार ध्यान आता रहा कि हमारे आसपास अंतहीन मुद्दे बिखरे हुए हैं, लेकिन उन पर लेखकों की दृष्टि कम ही ठहर पाती है। उषाकिरण खान ने एक नई ामीन तोड़ी और उसे भलीभांति कथारूप में सामने रखा, इसके लिए वे हमारी बधाई की हकदार हैं। ऐसी रचनाएं और भी लिखी जा रही होंगी। उन पर साहित्य संसार में विधिवत् चर्चा होगी तो लेखकों का उत्साह भी बढ़ेगा व पाठकों को भी कुछ नया मिलने का रुचिकर संतोष होगा।




        भाइ अविनाश के लिए: तारानन्द वियोगी: तारानन्द वियोगी के कर्मधारय का बैक फ्लैप- "यह पाया तो क्या पाया?" जिसके मैथिली अनुवाद "ई भेटल त की भेटल को " मैथिली अनुवाद पुरस्कार" सॉरी- मैथिली मूल रचना बाल साहित्य पुरस्कार दिया गया।


        भाइ श्रीधरम के लिए : हिल्कोर
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